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बड़े शहरों में नाम कर रहीं छोटे शहर की लड़कियां

मुजम्मिल

तकदीर से लड़कर, परिवार से जूझकर, मां-बाप को मनाकर, रिश्‍तेदारों से जूझकर छोटे शहर की लड़कियां बड़ा काम कर रही हैं। वैसे तो दिल्‍ली जैसे महानगर में ऐसी हजारों कहानियां होगी लेकिन कुछ कहानियां वाकई प्रेरणा देती हैं। ये उन्‍हें  भी हौसला देती हैं जिनके सपने परिवार की मर्जी के आगे दम तोड़ देते हैं।

सहारनपुर, उत्‍तर प्रदेश की श्रुति पेशे से फ्रीलांस (स्‍वतंत्र) फोटोग्राफर हैं। श्रुति को यह शौक सहारनपुर से दिल्‍ली ले आया। वो कहती हैं कि फोटोग्राफी का शौख बचपन से था लेकिन छोटे शहरों इस शौक को कोई खास जगह नहीं थी। दृश्‍यों और पलों को कैद करने के शौख को पेशे में तब्‍दील करने की ठानकर वो दिल्‍ली आईं। इसके बाद उन्‍होंने फोटोग्राफी को प्रोफेशनल कोर्स किए और ख्‍ाुद को निखारा। श्रुति कहतीं हैं यह पेशा पुरुषों के आधिपत्‍य वाला है। यहां महिलाओं के लिए काम करना मुश्‍िकल होता है। कई बार भीड़भाड़़ तो कई बार शहर से दूर के इलाकों में फोटोग्राफी के लिए जाना पड़ता है। धूल, धुआं और कठिन परिस्थितियों में फोटो शूट करना उनकी अपनी पसंद है लेकिन श्रुति के अनुसार उनके हाथ से कई ऐसे काम सिर्फ इसलिए वापस ले लिए गए क्‍योंकि वो महिला हैं। कई बार उन्‍हें रात की फोटो शूट के लिए जाना पड़ता है।

गोरखपुर के छोटे से गांव  की रहने वाली पूजा राय की पूजा अभी 22 साल की हैं। लेकिन उनके सपनों की उड़ान उन्‍हें दिल्‍ली ले आई आज वो इतनी छोटी सी उम्र में न केवल हिंदी फिल्‍मों के जाने माने चेहरों को निर्देशित कर चुकीं हैं बल्कि उन्‍हें अपने इशारों पर भी नचा रहीं हैं। भोजपुरी फिल्‍मों के महानायक कहे जाने वाले रवि किशन हों या हेटस्‍टोरी की ग्‍लैमरस गर्ल सुरवीन चोपड़ा या प्रीति झिंगियानी। वो इन दिनों मघ्‍यम बजट की फिल्‍मों के लिए काम कर रही हैं। पेशे से असिसटेंट डायरेक्‍टर पूजा कहती हैं कि छोटे शहरों से निकलना और वहां मानसिकता से झूझना बहुत मुश्‍िकल होता है। गांवों में लोगों को अब भी नहीं पता मैं क्‍या करती हूं। यहां तक की पापा के दोस्‍तों और भाई-बहनों के भी मेरा काम बस टाइम-पास लगता है। पूजा कहतीं हैं कि मैं अपने यहां लोगों को बताती हूं कि मैं किसी फिल्‍म में असिस्‍टेंट डायरेक्‍टर हूं तो उनके चेहरे पर आने वाले भाव ये बता देते हैं कि उन्‍हें कुछ खास समझ नहीं आया वो दोबारा पूछते हैं कि मैं क्‍या करती हूं। पूजा कहती हैं कि आज भी गांवों की स्‍ि‍थति ये है‍ कि यदि आप डॉक्‍टर, इंजीनियर और वकील नहीं हैं मतलब आप कुछ नहीं कर रहे। उन्‍हें पैशन और पेशे का अंतर समझ ही नहीं आता है।

पिता बीएसएफ में हैं परिवार के लोग चाहते थे कि 12वीं के बाद शादी कर लूं या गांव में ब्‍यूटी पार्लर की दुकान खोल लूं। लेकिन पूजा को लगा कि परिवार की मर्जी चली तो उनकी लाइफ खत्‍म हो जाएगी। इसके लिए पापा काे मनाना जरूरी था, पापा को मनाने के लिए मम्‍मी को समझाना जरूरी था। उन्‍होंने अपने घर में दिल्‍ली जाकर पढ़ने और पत्रकारिता करने की इच्‍छा जताई। लेकिन कोई नहीं माना, अंत में उन्‍होंने तुरंत शादी की बात कही। तब जाकर परिवार ने दिल्‍ली जाकर आगे की पढ़ाई करने की मोहलत पर हुआ। पूजा ने बताया कि वो बनना तो पत्रकार चाहती थीं लेकिन पेशे में असुरक्षा, अस्थिरता और रचनात्‍मकता की कम संभावनाओं ने उन्‍हें फिल्‍म की तरफ मोड़ दिया। उन्‍होंने बताया कि शादी के दबाव तो अब भी लेकिन वो अपने करिअर को वक्‍त देना चाहती हैं। वो कहती हैं कि शादी भी करिअर का हिस्‍सा है लेकिन उन्‍हें ऐसे किसी की तलाश्‍ा है जो उनके काम को समझे। स्‍वभाव से काफी भावुक पूजा कहती हैं कि मैनें पेशा तो भाव और भावनाओं पर आधारित चुना है लेकिन लोग मेरी भावनाओं को ही नहीं समझ पाते हैं। वो कहती हैं इस पेशे में कई बार मुश्‍िकल पल भी आते हैं, आप भावनात्‍मक रूप से टूटते हैं। उस वक्‍त आपको परिवार की जरूरत होती है। परिवार आपको सपोर्ट करता है लेकिन वो खुद को इतनी खुशनसीब नहीं मानतीं हैं। वो कहती हैं कि दिल्‍ली जैसे शहर में जब आप अकेले होते हैं तो टूटने के बाद खुद ही खुद को समेटना भी पड़ता है।

पूजा                                                                                                                            श्रुति

 

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