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बराबरी का तानाबाना

हम मतलब बराबर कितना सही कितना गलत —

स्त्री हो या पुरुष दोनों में समानता होनी चाहिए ये मैं इसलिए नहीं कह रही क्यूंकि मैं खुद एक स्त्री हुँ।
मेरा पोस्ट उनलोगो और समाज की कुत्सित मानसिकता को समर्पित है जिन्होंने बराबरी के मतलब का हक़ गलत समझ लिया है. आखिर हम दोनों ही इस सृष्टि की बेहतरीन रचनाएँ हैं तो फिर महिलाओं के साथ ज्यादती क्यों ??? हमे पता है इसका जवाब हममे से किसी एक के पास नहीं होगा लेकिन मुझे मालूम है कि अगर हम इसका जवाब तलाशे तो हमे अपने अंदर ही जवाब मिल जायेगा।

तो आइये इसका पता करते हैं कि इस गलत मानसिकता की शुरुवात कहाँ से हुई। खुद हमारे घर से ही इसकी शुरुवात होती है. हम भाई बहन साथ बड़े होते हैं लेकिन पक्षपात वहीँ से शुरू हो जाता है। बचपन से ही पुरूषवादी सोच समाज में हावी हो जाता है। जैसा की हम सभी जानते हैं की भारत गावों का देश है तो हमे कोई भी आंकड़े उस हिसाब से ही लेना होगा न की शहरी जीवन से। अभी भी कई ऐसे जगह हैं जहाँ लड़कियों को सिर्फ इसलिए शिक्षित करने से लोग डरते है की कहीं ये भी अपने भाई की तरह बराबरी का हक़ न मांगने लगे। मैं मानती हूँ कि लड़कियां शारीरिक रूप से कोमल होती है लेकिन उन्हें अपंगु बनाने में हम स्व्यं जिम्मेदार हैं।

आये दिन महिला सशक्तिकरण की बातें सुनने को मिलती है लेकिन ये तबतक संभव नहीं जबतक बराबरी का का हक़ नहीं मिलेगा। बेटे और बेटी को अगर हम समान रूप से सबल बनाते हैं तो वो न केवल अपने ज़िंंदगी के लिए सही फैसला लेंगी बल्कि उनके मन में विद्रोही स्वभाव भी नहीं पैदा होगा न ही वो गलत फैसला लेंगी भविष्य में। क्यूंकि आपके घर से निकल कर उसे एक नया घर भी बसाना होता है फिर से वह बराबरी की लड़ाई अपने पति के साथ लड़ेगी। सवाल ये नहीं है कि लड़किया ज्यादा पढ़ लिखकर विद्रोह करती हैं वो बस बराबरी का सम्मान खोजती है अपनों से ताकि वो खुद को उपेक्षित न समझे। अगर पहले भी महिलाओ को अपने अधिकारों का पता होता तो वो आवाज़ उठा सकती थी लेकिन उन्हें पता था कि घर के बाहर की जिम्मेदारी मेरे पति की है और मेरी दुनियाँ इस चारदीवारी तक ही सिमित है।

हालाँकि आज २१वीं सदी में जब हम हैं तो लोगो की सोच में थोड़ा सा बदलाव आया पर ये किंचित मात्र ही है अब भी। महिलाओं ने चारदीवारी से कदम क्या बढाये , हवा को झरोखे की बजाय दरवाजे खोल के महसूस क्या किया समाज में उथल पुथल शुरू हो गयी , ये लड़की  लड़को की  बराबरी करती है. अगर लड़की अपने कंधे पे जिम्मेदारी का बोझ उठा सकती है तो वो आर्थिक मसलो पर भी विचार कर सकती है अपने पति के साथ मिलकर। एक लड़की अगर अपने पिता का ख्याल शादी से पहले रख सकती है तो ठीक उसी प्रकार शादी के बाद भी कर सकती है। लेकिन हमने खुद ये समाज में भ्रांतिया फैला रखी है की नहीं लड़की पराया धन है। बेहद अफ़सोस जब उसे जन्म देकर हम खुद ही पराये कहते हैं तो उस पराये घर में उसका क्या सम्मान होगा।

 

मुझे उम्मीद है कि वो दिन जरूर आएगा जब महिलाओं के  समान  अधिकार की बात घर से ही शुरू होगी। अगर महिला बाहरी कामों में सहयोग कर रही है तो पुरुष को भी बिना सोचे समझे घर के कामों में हाथ बंटाना चाहिये। इससे दोनों को फ़ायदे होंगे महिला भी पुरुष का क़द्र करेंगी की पैसा कमाना इतना आसान नहीं और पुरुष भी महिला का क़द्र करेंगे की घर में भी बहुत सारे काम होते हैं जिनको व्यवस्थित करना इतना आसान नहीं है। यकीन मानिये रिश्तो में दोस्ती और सम्मान प्यार से ज्यादा महत्त्व रखते  हैं। उम्मीद है मेरा ये पोस्ट  सबको सही लगा हो ,बस अपना नजरिया बदल ले आज से। साथ ही साथ मैं अपने भाई , दोस्तों और सम्मानीय जनों  से  अनुरोध करती हूँ कि हमारे इस पोस्ट को अन्यथा न ले बस अपनी सोच में थोड़ा सा बदलाव लाकर एक बेहतर और सुद्दृढ समाज का निर्माण करने में हमारा सहयोग करे। आपके  व्यंग को  सहर्ष स्वीकार करुँगी और सुझाव को भी।

 

 

नीतू कुमारी के ब्लॉक से—

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