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मनुष्य जीवन के बनने-बिगड़ने आधार उसके विचार हैं

मनुष्य जीवन के बनने-बिगडने का आधार उसके विचार हैं। विचार जैसे होंगे, वैसे ही कार्य मनुष्य करेगा। उसका फल अच्छा होगा या बुरा, यह विचारों पर ही निर्भर है और विचार देने वाली पहली पाठशाला मां होती है, क्योंकि विचार बाल्यावस्था में ही बनने शुरू हो जाते हैं। बच्चे का मन होता है साफ, शुद्ध, पवित्र। मां जो उसे सिखाती है, वह सीखता चला जाता है। मां को तीर्थ कहा गया है। दुनिया के समुद्र को पार करने के लिये वह बच्चे को शरीर रूपी नाव देती है और अच्छे विचारों का चप्पू भी। वह प्यार भरी वाणी में कहती है ‘लो मेरे बेटे पार करो यह सागर किन्तु मां के विचार जैसे होंगे, जैसे संस्कार उसे मिले होंगे, उसी के अनुसार तो वह बच्चे को विचार दे पायेगी।

कुछ माताएं अपने बच्चों में परिवार के बडों, सम्बन्धियों आदि के विषय में नफरत के बीज बो देती हैं, उससे किसी भी प्रकार के सम्बन्ध न रखें। ऐसे पाठ जो मां अपने बच्चों को सिखायेंगी, वह उनकी हितैषी है ही नहीं, बल्कि शत्रु संज्ञा देना ही श्रेष्ठ होगा। मां का कत्र्तव्य है कि उसके सम्बन्ध किसी के साथ कैसे भी हों, बच्चों को सबका सम्मान करना सिखाये, अन्यथा आज तो वे दूसरे परिजनों से घृणा करते हैं, कल को मां-बाप का अपमान भी निश्चित करेंगे।

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