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दहेज उत्पीड़न में गिरफ्तारी होगी या नहीं, पुलिस तय करेगी: SC

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दहेज उत्पीड़न के मामलो में गिरफ्तारी हो या नहीं,यह तय करने का अधिकार फिर से पुलिस को दे दिया। कोर्ट ने आईपीसी की धारा 498-A के तहत दहेज प्रताड़ना की शिकायतें परिवार कल्याण समिति को भेजने का आदेश रद्द कर दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि इन मामलों में अब स्वचालित रूप से गिरफ्तारियां की जाएंगी। गिरफ्तारी से पहले पुलिस अरनेश कुमार मामले में दी गई व्यवस्था के अनुसार उचित प्रारंभिक जांच करेगी और नोटिस देगी। कोर्ट ने पति पक्ष को अग्रिम जमानत लेने का संरक्षण प्रदान किया और कहा कि ऐसी अर्जियों पर अदालत में उसी दिन सुनवाई की जानी चहिए। परिवार कमेटियां बनाने का आदेश दो न्यायाधीशों की पीठ ने गत वर्ष जुलाई में दिया था।

कोर्ट का मानना था कि दहेज कानून का दुरुपयोग हो रहा है और अनावश्यक गिरफ्तारियां हो रही हैं। ऐसे में बेहतर हो कि पुलिस से पहले ये मामले समाज के सम्मानित लोगों की कल्याण समिति के पास जाएं, ताकि न्याय के प्रशासन में कुछ मदद मिल सके। लेकिन इस फैसले में संशोधन के लिए याचिकाएं दायर की गईं। कहा गया कि इससे महिलाओं पर अत्याचार बढ़ जाएंगे। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने आदेश देते हुए कहा, ऐसा नहीं है। पुलिस को तुरंत गिरफ्तारी से रोकने के संबंध में फैसले पहले से मौजूद हैं। पीठ ने कहा, कोर्ट कानूनी प्रावधानों की व्याख्या के जरिये उनकी खामियों को नहीं भर सकता। दांडिक विधि की कमियों को संवैधानिक व्याख्या से दूर नहीं किया जा सकता।

पहले प्रारंभिक जांच होगी

पुलिस ललिता कुमारी मामले में संविधान पीठ के फैसले और अरनेश कुमार तथा डीके बसु के मामलों में दी गई व्यवस्था का पालन करेगी। इनमें साफ कहा गया है दहेज प्रताड़ना की शिकायतों में पहले प्रारंभिक जांच की जाएगी। यह जांच सूचना के सत्यापन के लिए नहीं, बल्कि यह देखने के लिए की जाएगी कि सूचना किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा कर रही है या नहीं।

गलती पुलिस की ओर से है

कोर्ट ने कहा कि संसद ने सोचकर धारा 498-A को गैरजमानती अपराध बनाया है। लेकिन गलती पुलिस की है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरनेश कुमार मामले में दिए गए निर्देश धारा 41 तथा 41-A की लाइन में हैं। यानी पुलिस पहले नोटिस देगी। वहीं डीके बसु मामले में पुलिस कार्रवाई की अधिकारियों द्वारा निगरानी के बारे में बताया गया है। इसका उद्देश्य अंधाधुंध गिरफ्तारी रोकना है।

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