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भारत में तंबाकू के सेवन से बढ़ रही कैंसर के मरीजों की संख्या, यूपी का हाल और बुरा

चिकित्‍सकों की मानें तो तंबाकू का सेवन चिंताजनक हैं। दुनियाभर में धूम्रपान करने वालों में भारत में लगभग 12% यानी लगभग 12 करोड़ लोग रहते हैं। भारत में 44% से ज्यादा पुरुष तम्बाकू का उपभोग गंध, चबाकर या धूम्रपान के जरिये करते हैं। तंबाकू का सेवन कार्डियोवस्कुलर और श्वसन रोगों, दिल का दौरा और कैंसर के बढ़ते जोखिम से संबंधित है।

सर्वेक्षणों से पता चलता है कि वयस्‍कों की तुलना में किशोरावस्था में धूम्रपान या तंबाकू के सेवन की लत आसानी से लग जाती है क्‍योंकि वे बहुत जल्‍दी सह‍कर्मियों और मीडिया से प्रभावित हो जाते हैं।

गाज़ियाबाद: विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, पूरी दुनिया में धूम्रपान करने वालों में भारत में 12% हैं जिनकी संख्‍या लगभग 12 करोड़ है और भारत में तम्बाकू के सेवन के कारण हर साल 10 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है।

चौंकाने वाला आंकड़ा यह भी बताता है कि 16 साल से कम उम्र के लगभग 24% बच्‍चों ने अतीत में तंबाकू का सेवन कुछ अन्‍य तरीकों से किया था और और अब भी 14% बच्‍चे तम्बाकू उत्पादों का उपभोग कर रहे हैं। धुआं रहित तम्बाकू भारत में सिगरेट या बिड़ी से अधिक प्रचलित है, और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 44% पुरुष तंबाकू का उपभोग किसी न किसी रूप में करते हैं।

“पुरुष तंबाकू की खपत बहुत अधिक करते हैं। यद्यपि उत्तर प्रदेश में 53 प्रतिशत पुरुष तंबाकू का उपभोग करते हैं, भले ही आप इसे किसी भी तरीके से लें, तंबाकू आपके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। एसीटोन और टार युक्‍त निकोटीन और कार्बन मोनोऑक्साइड युक्‍त तम्बाकू कोई भी उत्पाद सुरक्षित विकल्‍प नहीं है। जिन पदार्थों का सेवन आप श्वांस के जरिये करते हैं, वे सिर्फ आपके फेफड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं बल्कि आपके पूरे शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। निकोटिन, जो तंबाकू नशे की लत बना देती है, वह आपके दिमाग में बहुत तेजी से प्रभाव डालती है और जब आप धूम्रपान करते हैं तो आपको अच्छा महसूस होता है, इससे आपको चिंता, घबराहट, उदासीनता और तनाव हो सकता है। तंबाकू के सेवन से मसूड़ों से खून निकल सकता है, और कुछ मामलों में यह मुंह और गले के कैंसर का कारण बन सकता है, इसके अलावा इससे दिल की धड़कन और रक्‍तचाप में बढ़ोतरी हो सकती है जो कि दिल की बीमारी और दिल के दौरे का कारण बन सकती है।” ये बातें डॉ. ज्ञान भारती, कंसल्टेंट-इंटर्नल मेडिसन, कोलंबिया एशिया हॉस्‍पीटल, ग़ज़िआबाद ने कहीं।

महामारी संबंधी साक्ष्य बताते हैं कि तम्बाकू मुंह संबंधित विभिन्न बीमारियों का कारण बनता है जिसमें पीरियडोंन्टल बीमारी, मसूड़ों की बीमारी, दांतों का गिरना, दांतों में धब्‍बे पड़ना, मुंह से दुर्गंध आना, बिनाइन म्यूकोसल समस्‍या, कैंसर से पूर्व की स्थितियां और मुंह में घाव शामिल हैं। शोध के अनुसार, सिगरेट में लगभग 600 अवयव होते हैं, जिनमें से कई सिगार और हुक्के में भी पाए जा सकते हैं। इन पदार्थों को जलाने पर 7,000 से अधिक रसायन बनते हैं, जिनमें से कई जहरीले होते हैं और उनमें से कम से कम 69 ऐसे हैं जो कैंसर से संबंधित हैं।

तंबाकू का सेवन सूखे, पीले रंग की त्वचा और झुर्री के साथ एम्फिसीमा और फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकती है। तंबाकू के सेवन के मांसपेशियों में रक्त प्रवाह और ऑक्सीजन के प्रवाह को रोकने जैसे कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं जो किसी को अभ्यास या खेल के दौरान मांसपेशियों को और अधिक चोट पहुंचाने का कारण बन सकता है। इसके अलावा, तंबाकू के सेवन से शरीर में चल रही जटिलताओं के साथ-साथ शरीर प्रणालियों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि युवा वयस्कों की तुलना में धूम्रपान या तंबाकू के सेवन में अधिक लिप्‍त होते हैं क्योंकि वे आसानी से सहकर्मियों और मीडिया से प्रभावित हो जाते हैं।

“किशोरावस्था की उम्र धूम्रपान शुरू करने और निकोटीन के आदी होने के लिए बहुत नाजुक स्थिति है क्योंकि वे अपने किशोरावस्था के दौरान तेजी से हार्मोनल और संज्ञानात्मक परिवर्तनों से गुजरते हैं और वे सांस्कृतिक, सामाजिक, पारिवारिक और व्यवहारिक कारकों से भी प्रभावित होते हैं। किशोरों को धूम्रपान शुरू करने के लिए प्रेरित करने वाले कारकों में सिगरेट, तनाव, आत्म-सम्मान की परवाह न होना, शैक्षिक प्रदर्शन खराब होना, और स्कूल में माता-पिता और परिवार के अन्‍य सदस्यों, दोस्तों और कर्मचारियों के बीच धूम्रपान की घटनाएं शामिल हैं। इसके अलावा, जो धूम्रपान करते हैं वे दूसरों को भी इस जोखिम में डलते हैं। धूम्रपान न करने वालों में अप्रत्‍यक्ष धू्म्रपान भी फेफड़े और श्‍वसन संबंधी समस्‍यायों का कारण बनता है।“ डॉ. ज्ञान भारती ने कहीं ये बातें

अध्ययनों से पता चलता है कि धूम्रपान करने वाले धूम्रपान न करने वालों की तुलना में लगभग दस साल कम जीवित रहते हैं और धूम्रपान बंद करने के प्रयास 30 साल की उम्र से पहले शुरू किये गये धूम्रपान से जुड़ी मौत के 97% जोखिम को कम कर सकते हैं। यह किशोरावस्था में धूम्रपान के नकारात्मक परिणामों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के महत्व को रेखांकित करता है ताकि धूम्रपान से होने वाली मौत, मृत्यु दर, और मौखिक और व्यवस्थित स्वास्थ्य असमानताएं कम उम्र में ही रोका जा सके।

यह तथ्य सवाल उठाता है कि क्या तंबाकू के सेवन के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जागरूकता स्कूलों में पाठ्यक्रमों में शामिल होनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूली बच्चों को धूम्रपान से दूर रहने के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए और स्कूलों को बच्चों के लिए इष्टतम स्वास्थ्य प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए सहायक वातावरण विकसित करने के लिए शिक्षकों, माता-पिता और मौखिक स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच नेटवर्क और संबंध बनाने के अवसर प्रदान करने चाहिए। इसके अलावा, समाज को तंबाकू के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य परिणामों, मौखिक स्वास्थ्य संवर्धन और तंबाकू की रोकथाम नीतियों और कार्यक्रमों के बारे में बड़े पैमाने पर शिक्षित करने के लिए कार्यक्रमों को स्कूलों में सबसे अच्छे तरीके से कार्यान्वित किया जा सकता है।

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