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एनकाउंटर या सरकारी हत्या?

अदालत का काम इंसाफ देना नहीं है इस बात को यूपी पुलिस ने आजकल अपना ध्येय वाक्य बना लिया है। शायद उन्हें इसकी प्रेरणा माननीय सुप्रीम कोर्ट के उस टिप्पणी के बाद मिली है। जिसमें पिछले दिनों कोर्ट ने कहा था कि मस्ज़िद नमाज़ पढ़ने के लिए नहीं होती। यूपी के कैराना में पिछले साल नौशाद का पुलिस ने एनकाउंटर किया था। नौशाद के परिवार ने जब मानवाधिकार आयोग में शिकायत की तो उनके ऊपर गैंगरेप के केस लगा दिए गए। परिवार को कई दिनों तक नजरबंद रखा गया। उनके घर खाना लेकर आने वाले पड़ोसियों को रोका गया। कुछ दिन पहले पीड़ित परिवार ने प्रेस क्लब दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस करके यूपी पुलिस पर कई गंभीर आरोप लगाए। नौशाद की मां शाहीन ने पुलिस पर आरोप लगाते हुए सवाल पूछा था कि मेरा बेटा 16 साल का था। पुलिस बताए कि 10 और 12 साल के लड़कों ने लूट और गोली चलाने का अपराध कैसे किया होगा? इस उम्र के लड़के बाल सुधार गृह जाएंगे या जेल?

बागपत के सुजीत गुर्जर का यूपी पुलिस ने पिछले साल सितम्बर में एनकाउंटर किया था। इनके परिवार ने भी जब मानवाधिकार आयोग में केस दर्ज कराया तो सुमित के भाई और उनके दो चचेरे भाईयों पर गैंगरेप का केस लगा दिया गया। नोएडा पुलिस का दावा है कि कैश वैन लूटने के बाद ड्राइवर की हत्या के बाद दो बदमाशों के साथ सुमित गुर्जर भाग रहा था, तभी उसे मुठभेड़ में मार दिया गया। जबकि परिजनों का कहना है कि नोएडा पुलिस सुमित को पूछताछ के लिए उठाकर ले गई थी, फिर सुमित ने कैसे लूट कर ली। सुमित के परिवार के लोगों का कहना है कि सुमित के ऊपर एक भी मुकदमा दर्ज नहीं है। बागपत में ही नहीं शामली, मुज्जफरनगर, सहारनपुर में भी सुमित की कोई क्राइम हिस्ट्री नहीं है।

इसी साल फरवरी में नोएडा के जिम ट्रेनर जितेंद्र यादव को नशे में धुत एक दरोगा ने प्रमोशन के लालच में गोली मार दी। जितेंद्र के चार साथियों को ग़ायब करने का आरोप भी पुलिस पर लगा था। काफी हंगामे के बाद दरोगा को गिरफ्तार किया गया। उसके कुछ दिनों बाद व्हाट्सएप पर यूपी पुलिस के एनकाउंटर का रेट कार्ड भी वायरल हुआ था। जो बाद में सच साबित हुआ।

कानून के राज के नाम पर यूपी में सरकारी हिंसा करने वाली योगी सरकार को एक ना एक दिन बेनाक़ब होना ही था। जो धीरे – धीरे हो रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने एक बयान में कहा था कि अपराधी जेल में होंगे या मुठभेड़ में मारे जाएंगे और हर किसी को सुरक्षा की गारंटी दी जानी चाहिए, लेकिन जो लोग समाज की शांति में दखल डालना चाहते हैं और बंदूक में विश्वास रखते हैं, तो उन्हें बंदूक की भाषा में ही जवाब दिया जाना चाहिए। उनके इस बयान पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया था। योगी आदित्यनाथ की इस टिप्पणी बाद पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी द्वारा यूपी में फर्जी मुठभेड़ होने का आरोप लगाने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। आज विवेक तिवारी का केस भी हम सभी के सामने है। आज फिर दो बेटियों अनाथ हुई हैं। ऐसे ही ना जाने कितनों बच्चों को योगी की पुलिस ने उनकी शह पाकर अनाथ बनाया है।

जिस तरह गुजरात में फर्जी एनकाउंटर की सज़ा पुलिस वाले भुगत रहे है। उसी तरह एक दिन यूपी पुलिस को भी भुगतना होगा। नेताओं को शायद ही कभी सजा मिल पाती है इसलिए हम मानकर चलते है कि इससे योगी आदित्यनाथ को कोई खतरा नहीं है। अगर खतरा हो भी गया तो उन्हें अपने ऊपर दर्ज मुकद्दमें वापस लेने का अनुभव है। उनकी सीएम की कुर्सी खतरे में आ भी गई तो गोरखनाथ पीठ के महंत की कुर्सी उनके पास ही रहेगी। लेकिन उनकी शह पाकर जो पुलिस वाले आज मेडल के नाम पर सरकारी हिंसा कर रहे है। उनका परिवार तबाह हो जाएगा। ये बात मुख्यमंत्री से ज्यादा इन पुलिस वालों को समझना चाहिए।

अंकित द्विवेदी, इंडिया टीवी

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