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फिल्म रिव्यू:कुछ नया नही है अली फजल के ‘मिलन टॉकीज’ में

 

मिलन टॉकीज का एक डायलॉग!!नया नया प्यार में सेक्स ज्यादा होता जब प्यार पुराना हो जाता तो… सेक्स भी त्योहार के तरह हो जाता बात तो बिलकुल सही है!

इलाहाबाद का एक लड़का का सपना है एक बड़ा फिल्ममेकर बने‌। लेकिन उसकी जिंदगी में संघर्ष बहुत है। वो इलाहाबाद रहकर ही वो छोटी-मोटी फिल्म बनाकर अपनी जिंदगी चला रहा‌ इसी के साथ वह कुछ दोस्तों के साथ एक रैकेट भी चला रहा है।

ये रैकेट परीक्षा में नकल करवाने का काम करता है। जनार्दन (आशुतोष राणा) को अपनी बेटी मैथली (श्रद्धा श्रीनाथ) को बीए की परीक्षा में पास करवाना है।

इस काम के लिए जनार्दन, अनू की मदद लेता है. यहीं से अनू मैथली के संपर्क में आता है और दोनों की प्रेम कहानी परवान चढ़ती है. लेकिन मैथली के पिता जनार्दन को ये रिश्ता मंजूर नहीं। दरअसल, वह अपनी बेटी की शादी किसी दूसरे लड़के के साथ करवाना चाहता है। कहानी में ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है और देखने को मिलती है प्यार की अग्नि परीक्षा।
क्या अनू मैथली का प्यार हासिल कर पाता है, तिग्मांशु धूलिया की फिल्म देखने जाना होगा.

जाहिर सी बात है कि मिलन टॉकीज की कहानी में कुछ नयापन नहीं है वहीं घिसी-पिटी कहानी। ऐसी कहानियों के प्लाट पहले भी कई मर्तबा हमारे सामने आ चुके हैं.।इसमें कोई नया ट्रीटमेंट भी नजर नहीं आता।

ऊपर से फिल्म की कहानी में कई जगह स्पीड ब्रेकर हैं. इस वजह से ये कमजोर गति से आगे बढ़ती है. अंत तक आते-आते तमाम चीजें उबाऊ लगने लगती हैं।

फिल्म के पहले हाफ में कहानी को लेकर कुछ रोचकता है. लेकिन दूसरे हाफ में फिल्म पुरी तरह से बोर करती है।कह सकते हैं मिलन टॉकीज की कहानी बिखराव का शिकार हो गई है

अब अगर किसी फिल्म की नींव यानी कहानी ही कमजोर हो तो अच्छे कलाकार भी इसमें क्या कर सकते हैं।

मिलन टॉकीज की स्टार कास्ट शानदार है। अनू के रूप में अली फजल का काम बहुत बढ़िया है।

बड़े पर्दे पर अपना पदार्पण कर रहीं श्रद्धा श्रीनाथ ने जरूर कुछ हद तक प्रभावित किया है

फिल्म में उन्होंने डांस भी किया, इंटेंस सीन्स भी दिए और ड्रामा भी काफी किया है. दिक्कत यह हुई कि उनके किरदार में गहराई ही नहीं है. ठहराव की भी कमी लगती है।

स्क्रीन पर उनकी केमिस्ट्री अली के साथ जचीं है, लेकिन कहानी की वजह से दोनों के पास दर्शकों को बांध कर रखने के लिए कुछ भी नहीं है. आशुतोश राणा की काबिलियत को देखते हुए लगता है मिलन टॉकीज उनके लिए नहीं थी. उनका किरदार बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं लगा.

वैसे अगर ये फिल्म अगर 20 साल पहले आई होती तो शायद उसकी कहानी और किरदारों में लोगों को भरोसा होता. फिल्म में संजय मिश्रा का भी छोटा रोल है. लेकिन वो भी कुछ ख़ास नजर नहीं आते. इस रोमांटिक कहानी में एक विलेन भी हैं. सिकंदर खेर ने यह किरदार निभाया है. लेकिन स्क्रीन पर वो बिल्कुल भी नहीं एक्टिंग कर पाये।

वैसे इस फिल्म में अगर किसी को देखकर चेहरे पर मुस्कान आती है तो वो हैं तिग्मांशु धूलिया. तिग्मांशु ने फिल्म में एक्टिंग भी की है। उन्होंने अनू के पिता का किरदार निभाया है. उनकी कॉमिक टाइमिंग और पंचेस सटीक हैं. फिल्म में बाकी कलाकारों का किरदार ज्यादा डेवलप नहीं है।

तिग्मांशु धूलिया ने मिलन टॉकीज के साथ एक शुद्ध देसी रोमांटिक फिल्म बनाने की कोशिश की है।

पूरी फिल्म में ये नहीं बताया की मैथली के पिता उनके रिश्ते को स्वीकार क्यों नहीं करते हैं. ये पहलू आखिर तक खटकता है. फिल्म की लेंथ भी समझ से परे है. क्लाइमेक्स भी निराशाजनक है और तमाम चीजें पहले से ही पता चल जाती हैं।

मिलन टॉकीज के गाने भी याद किए जाने लायक नहीं हैं. पूरी फिल्म में बस सोनू निगम का ‘शर्त’ गाना ही थोडा सुकून देता है. बैकग्राउंड स्कोर भी ठीक करना है।

रोमांटिक फिल्में देखने का शौक है तो फिल्म जाकर देखें

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