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Manto Movie Review: सआदत हसन मंटो को पर्दे पर हूबहू उतारने में कामयाब रहे नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी

मंटो’ मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो की लाइफ पर बनी एक बायॉपिक है, जिसमें उनकी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव से लेकर विवाद और खुशनुमा पलों को खूबसूरती से परोसा गया हैं।

अभिनेत्री और निर्देशक नंदिता दास की फिल्मों का चयन हमेशा से ही बहुत हटकर करती हैं।उन्होंने फिल्म फिराक से  डायरेक्शन की दुनिया में कदम रखा था। इस बार नंदिता ने उर्दू शायर और नामचीन शख्सियत सआदत हसन मंटो के जीवन के ऊपर फिल्म बनाने का प्रयास किया है और अच्छी रिसर्च के साथ उनके जीवन के चार साल को नंदिता ने दर्शाने की कोशिश की है।

फिल्म में दिखाया गया हैं कैसे होती हैं एक लेखक की जिंदगी।लेखक जब भी कुछ लिखता हैं तो उसे अकेलेपन की जरुरत होती हैं ताकी जो सोच रहा हैं वही लिख सके।लेखक का साथी अकेला पन और उसका कलम होता हैं। लोगों के पास  होने के बावजूद वो  अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं। या यूं कहें कि उन्हें अपनी असल और काल्पनिक ज़िंदगी के बीच तालमेल बिठाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। उर्दू के महान कवि और लेखक सआदत हसन मंटो को काल्पनिक दुनिया अपने आस-पास की असल दुनिया के मुकाबले कहीं ज़्यादा रियल लगी, बावजूद इसके उनकी कल्पना में समाज की कड़वी हकीकत ही रहती, खासकर वह कड़वी सच्चाई, जो उन्होंने खुद करीब से महसूस की।

ऐक्ट्रेस और फिल्ममेकर नंदिता दास ने मंटो की ज़िंदगी में रियल और काल्पनिक समाज के बीच की इसी पृथकता को फिल्मी परदे पर शानदार तरीकें से  और दिल को छू जाने वाले अंदाज़ में उतारा। मंटो की ज़िंदगी में सेंसर का अहम हिस्सा रहा। उनके लिखे लेखों पर सेंसरशिप से लेकर अश्लीलता तक के केस भी हुए। सेंसरशिप मंटो की ज़िंदगी में एक ऐसा हिस्सा था, जिसे उन्होंने जिंदगी भर झेला और उस दौरान उनकी कैसी व्यथा, कैसी स्थिति रही होगी, इसे बेहद गहराई और खूबसूरती से नंदिता दास ने फिल्म में दिखाया उन्होंने भारत-पाक विभाजन से लेकर पुरुष प्रधान समाज वाली मानसिकता से लेकर धार्मिक असिहष्णुता, बॉम्बे के लिए प्यार जैसे कई वाकयों को दिलचस्प अंदाज़ में दर्शकों के लिए परोसा है।

कार्तिक विजय की सिनेमटॉग्रफी और रीता घोष के प्रॉडक्शन डिज़ाइन से आजादी से पहले और उसके बाद का एक पर्फेक्ट सीन उभरकर सामने आता है। देखकर लगता है जैसे फिल्म उसी दौर में जाकर शूट की गई हो।

अभिनय के क्षेत्र में यह फिल्म बहुत आगे है। एक से बढ़कर एक कलाकार हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी अब हर रोल को यादगार बनाने लगे हैं। चाहे वो बदलापुर का विलेन हो या गैंग आँफ वासेपुर का फैजल। मंटो  के किरदार में तो वे घुस ही गए हैं।स्क्रीन पर जैसे 40 के दशक के मंटों को नवाजुद्दीन ने जीवंत कर दिया है।

जो लोग मंटो को पहले से जानते हैं उन्हें यह मूवी बहुत अच्छी लगेगी। साथ ही नए दर्शकों के लिए भी यह फिल्म एक बेहतरीन बायोपिक के रूप में बनाई गई है। एक्टिंग की दृष्टि से नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने मंटो के व्यक्तित्व को पर्दे पर एकदम से जिंदा कर दिया है। नवाजुद्दीन ने मंटो की प्रतिभा, हाज़िरजवाबी, और खुद के साथ आत्मघातपन और दर्दनाक दुर्दशा को पूरी ईमानदारी से पेश किया है। साथ ही रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी के रूप में शानदार काम किया हैं।। साथ ही फिल्म को काफी  खुबसूरत तरीक़े से  दर्शाया गया है। आजादी के समय को नंदिता दास ने उस समय प्रयोग में आने वाले उपकरणों और वेशभूषा के साथ-साथ सभी जरुरी बातो का ध्यान रखते हुए दिखाया है।

स्टार:5/3.5

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