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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: जानें, आधार की वैधता की सुनवाई कैसे बदली राइट टू प्राइवेसी में

सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रत्येक नागरिक को प्रभावित करने वाले अपने आज के ऐतिहासिक फैसले में राइट टू प्राइवेसी को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया। प्रधान न्यायाधीश जे़ एस़ खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने फैसले में कहा कि राइट टू प्राइवेसी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पूरे भाग तीन का स्वाभाविक अंग है। पीठ के सभी नौ सदस्यों ने एक स्वर में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया।

जानें कैसे, आधार अनिवार्य कैसे बन गया राइट टू प्राइवेसी का मामला

 


इस मामले में याचिकाकर्ता में कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस केएस पुट्टस्वामी, नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स के पहले चेयरपर्सन रहे मैग्सेसे पुरस्कार सम्मानित शांता सिन्हा और रिसर्चर कल्याणी सेन मेनन शामिल हैं। इन्होंने याचिका में कहा था कि कोर्ट का आदेश है कि आधार अनिवार्य नहीं होगा और स्वैच्छिक होगा लेकिन सरकार तमाम योजनाओं जैसे स्कॉलरशिप, राइट टू फूड से लेकर तमाम योजनाओं में इसे अनिवार्य कर रही है।

सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर कहा कि 30 जून के बाद करीब 17 तरह के वेलफेयर स्कीम में आधार अनिवार्य होगा। इस मामले में आधार कार्ड की अनिवार्यता के खिलाफ दाखिल याचिका पर तुरंत सुनवाई होनी चाहिए और बेंच को इसके लिए आदेश पारित करना चाहिए। इस पर केंद्र सरकार से अपना रखने के लिए कहा गया था।

इसके बाद 23 जुलाई 2015 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि राइट टू प्राइवेसी संविधान के तहत मूल अधिकार नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से पेश तत्कालीन अटर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि संविधान में देश के नागरिकों के लिए राइट टू प्राइवेसी का प्रावधान नहीं है। उन्होंने 1950 के 8 जजों के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि राइट टू प्राइवेसी मूल अधिकार नहीं है। अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि राइट टू प्राइवेसी से संबंधित कानून अभी तक स्पष्ट नहीं है।

आधार कार्ड के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि राइट टू प्राइवेसी, मूल अधिकार नहीं है। सरकार ने कोर्ट में कहा था कि इस सवाल को अभी तय किया जाना है और ऐसे में मामले को बड़ी पीठ को रेफर कर देना चाहिए। आधार कार्ड के खिलाफ दाखिल याचिका में आधार कार्ड की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने दलील देते हुए सरकार द्वारा तमाम प्राइवेट डेटा लिए जाने पर सवाल उठाया था और कहा था कि यह आम आदमी के राइट टू प्राइवेसी में दखल है। आधार स्कीम पूरी तरह से मूल अधिकार में दखल है। संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद-21 (राइट टू लाइफ ऐंड लिबर्टी) में दखल है।

11 अगस्त 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि आधार कार्ड किसी भी सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए अनिवार्य नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि आधार किसी भी सामाजिक लाभ वाली योजना के लिए भी अनिवार्य नहीं होगा। कोर्ट ने कहा था कि सरकार को इस बात की स्वतंत्रता है कि वह पीडीएस, केरोसिन और एलपीजी वितरण में आधार का इस्तेमाल कर सकती है लेकिन यह साफ किया कि इन मामलों में भी आधार अनिवार्य नहीं होगा।

इसके बाद राइट टू प्राइवेसी के मुद्दे को तय करने के मामले को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने संवैधानिक बेंच रेफर कर दिया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याची का कहना था कि आधार कार्ड के लिए जाने वाली जानकारी राइट टू प्राइवेसी में दखल है और यह मूल अधिकार है। वहीं केंद्र का कहना था कि राइट टू प्राइवेसी मूल अधिकार नहीं है।


15 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ ने सरकार को इस बात की इजाजत दी थी कि वह पीडीएस, केरोसिन और एलपीजी वितरण के अलावा पीएम जनधन योजना, मनरेगा, पीएफ और पेंशन स्कीम के लिए आधार का इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने फिर साफ किया था कि इन मामलों में भी आधार अनिवार्य नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त के आदेश में बदलाव किया था और सरकार को उक्त योजनाओं के लिए भी स्वैच्छिक तौर पर आधार के इस्तेमाल की छूट दी है।

 

09 जून 2017: आईटी रिटर्न के लिए आधार की अनिवार्यता संबंधी आईटी ऐक्ट की धारा-139 एए की संवैधानिक वैलिडिटी को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है और कहा है कि ये संविधान के अनुच्छेद-14 और 19 का उल्लंघन नहीं करता। जस्टिस एके सिकरी की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि आईटी एक्ट में बदलाव कर 139 एए का प्रावधान किया गया है जिसके तहत आईटी रिटर्न के लिए आधार की अनिवार्यता की बात है और पैन से आधार के लिंक करने का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिनके पास पैन कार्ड नहीं है उन्हें पैन के लिए आधार देना होगा और इस बाबत आईटी एक्ट को वैध ठहराया गया है। कोर्ट ने कहा कि नए पैन बनवाने के लिए आधार नंबर देना होगा। जिनके पास पैन कार्ड हैं, उनके मामले आधार से संबंधित राइट टू प्राइवेसी के मामले में फैसले पर निर्भर करेगा। जिन्होंने आधार कार्ड का एनरॉल्मेंट करा लिया है उनके लिए एक्ट लागू होगा यानी उन्हें आईटी रिटर्न के लिए आधार देना होगा। लेकिन जिन्होंने आधार कार्ड नहीं बनाया है वह अभी फ्री हैं । कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे लोगों का पैन अवैध नहीं होगा और वह राइट टू प्राइवेसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राइट टू प्राइवेसी के मुद्दे पर सुनवाई शुरू की। यह सुनवाई दो अगस्त को पूरी हुई थी। सुनवाई के दौरान निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल करने के पक्ष और विरोध में दलीलें दी गईं।

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