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महिलाएं करें ड्राइव तो समझिए सुरक्षित हैं आप

मुजम्मिल

यूं तो महिलाओं और लड़कियों को सड़क पर वाहन चलाते देख कर मजाक उड़ाने वाली बातें करते सुना होगा। जैसे मैड़म जी गाड़ी चला रहीं है वो देखो ब्रेक लगाने से पहले उनके पांव हवाइजहाज के पहियों जैसे पहले से ही बाहर आ जाते हैं। ये अक्‍सर देखा जा सकता है कि यदि कोई महिला या लड़की वाहन चलाती हुई गुजरती है तो कुछ नजरे यूं घूरती हैं कि जैसे वो सवाल कर रहे हों,  मैडम जी गाड़ी चला रही हैं ? खैर, यदि आप भी इस कतार में शामिल हैं तो अब आपको यह सोच बदल लेने की जरूरत है। और इसकी बजाए यह सोचने की जरूरत है कि आपके के बगल वाली ड्राइवर यदि महिला है तो अाप ज्‍यादा सुरक्षित हैं। इस सोच के साथ आप निश्‍िचंत हो सकते हैं। दिल्‍ली पुलिस की ओर से जारी की गई ताजा रिपोर्ट ये बताती है कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा अच्छी ड्राइवर हैं। जबकि युवाओं और पुरुषों का गाड़ी चलाते वक्‍त अधिक ध्यान भंग होता है। इतना ही नहीं ज्‍यादा उम्र में महिलाएं गाड़ी चलाते समय सड़क पर ज्यादा सतर्क रहतीं हैं। रिपोर्ट बताती है कि 12 फीसद दुर्घटनाएं ध्यान भटकने से होते हैं।

महिलाओं के नाम से खरीदी जा रही गाडि़यां लेकिन चलाती नहीं इस रिपोर्ट, सड़क पर लगातार बढ़ती दुर्घटनाओं और रोड रेज के बवाजूद दिल्ली जैसे महानगर में जहां ज्यादातर वाहन पुरुष चलाते हैं। यहां लाइसेंसधारी 71 पुरुषों के मुकाबले सिर्फ एक महिला लाइसेंस होल्डर है। वहीं आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में रजिस्टर्ड कुल गाड़ियों में से 11 फीसद वाहन महिलाओं के नाम पर हैं। जो यह बताती हैं कि परिवारों में टैक्‍स बचाने आदि के लिए महिलाओं के नाम पर गाड़ियां खरीदी जा रही हैं, लेकिन वो अक्सर इन गाड़ियां को खुद नहीं चलातीं।

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में यातायात के नियम तोड़ने में 26 लाख चालान काटे गए। जिनमें केवल 600 चालान महिलाओं के कटे।

तेज वाहन चलाने के कुल 1,39,471 मामलों में से 514 महिलाएं शामिल थीं। ओवर स्पीडिंग सड़क दुर्घटनाओं की प्रमुख वजहों में से एक है। वहीं यातायात सिग्नल तोड़ने के कुल 1,67,867 मामलों में चालान काटे गए। जिनमें से केवल 44 चालान महिलाओं के कटे।  एक यातायात पुलिसकर्मी के मुताबिक महिलाएं ट्रैफिक सिग्नल पर गाड़ी रोकती हैं और नियम तोड़ने से ड़रतीं हैं। इसलिए उन्हें डरपोक भी कहा जाता है। दिल्ली यातायात पुलिस  की माने तो वो ट्रैफिक पुलिस के रोकने पर घबरा जातीं हैं और वे ठीक तरीके से कागज आदि मांगने पर भी नहीं बता पातीं। इसलिए महिलाएं इन झंझटों से बचने के लिए भरसक नियमों का पालन करती हैं। अधिकारी ने दावा कि 99 फीसद कामकाजी महिलाएं नियमों का पालन करतीं हैं।  जबकि पुरुष सीटबेल्‍ट नहीं लगाते और रश ड्राइविंग ज्‍यादा करते हैं। कुछ महिलाओं को छोड़ दें तो महिलाएं शराब पीकर भी वाहन नहीं चलातीं।

2015 में लंदन में हुए एक शाेध के हवाले से यह पुष्टि होती है कि औरतें पुरुषों की तुलना में सड़क पर वाहन चलाने में बेहतर चालक साबित होती हैं। जिसकी वहज से दुर्घटनाओं की संभावना काफी कम हो जाती है। शोध की मानें तो सुरक्षित ड्राइविंग के हर मानक पर महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ा है। लंदन के सबसे व्यस्त हाइड पार्क कॉर्नर पर शोधकर्ताओं ने महिलाओं और पुरुषों को ड्राइविंग करते देखा। उन्होंने पाया कि पुरुष ड्राइविंग करते समय ज्यादा जोखिम उठाते हैं। उन्‍होंने पाया कि वो अपनी कार या वाहन को रोकते या घुमाते समय सामने वाले वाहन या कार के ज्यादा नजदीक ले जाते हैं। इतना ही नहीं वो वह वाहन चलाते समय भी आगे वाले वाहन से सुरक्षित दूरी नहीं रखते हैं।

दिल्‍ली यातायात पुलिस के मुताबिक विदेश और भारत की सड़कों पर वाहन चालकों का हाल लगभग एक जैसा ही है। भारत में भी लड़कियों के शराब पी कर वाहन चलाने के मामले कम हैं। वहीं 99 फीसद लड़कियां गाडि़याें के सीट बेल्‍ट लगाकर ही वाहन चलातीं हैं।

लोग जान बूझ कर देते हैं हार्न ‘जैसे चलानी नहीं आती तो घर जाओ’ शुरूआत में जब मैं सड़क पर गाड़़ी चलाती थी तब मैं ज्‍यादा डरी होती थी। अब भी ये डर रहता है और बहुत सर्तक होकर चलाती हूं। अक्‍सर जब मैं गाड़ी चलाती हूं तो वाहन के बंद होने पर बहुत ज्‍यादा नर्वसनेस होती है। लोग जानबूझ कर पीछे से हार्न देने लगते हैं। जैसे उनकी गाड़ी बंद ही नहीं हो सकती। उनका बाॅडी लैंग्‍वेज ऐसा होता है जैसे गाड़ी बंद हो गई तो मुझे चलानी नहीं आती। और नहीं आती तो गाड़ी सड़क पर क्‍यों लेकर आ गई। वो ऐसे घूरते हुए जाते जैसे गाड़ी चलाना लड़कों को ही आता है। लेकिन अब मैं इनकी परवाह नहीं करती। अक्सर लोग रास्‍ता देते हुए ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं कि जैसे आप ही आगे चले जाएं।
निधि अग्रवाल, गृहणी और फ्रीलांसर कंटेंट राइटर

अब मेरा भाई खुद कहता है ‘तू ही गाड़ी चला तू मुझसे बेहतर चलाती है ‘ मैं 10-12 साल से अपनी गाड़ी चला हूं। लोग अक्‍सर गाड़ी चलाते वक्‍त ऐसा जताते हैं कि आप कहां सड़क पर गाड़ी लेकर आ गईं। ऐसा टर्निंग पर अक्‍सर होता है पीछे से लोग तेजी से आएंगे और ब्रेक लगाकर ऐसा लुक देंगे जैसे ‘आप देख कर गाड़ी नहीं चला सकतीं हैं क्‍या’। लड़कियों को गाड़ी चलानी आनी चाहिए। उनके मां बाप को इसके लिए भी कहना चाहिए। ये आत्‍मनिर्भरता का ऐहसास करता है। एक भाई के नजरिए से आप देखें तो मेरे भाई मुझे कभी गाड़ी नहीं चलाने देते उन्‍हें लगता है कि मैं दुर्घटना कर दूंगी। शुरुआत में एक बार मेरा भाई गाड़ी में बैठा था और गाड़ी बंद हो गई। इस पर मेरा भाई मुझपर ही हाइपर हो गया बोला पीछे बैठ लेकिन आज गर्व महसूस होता है जब वाे खुद कहता है  तू अच्‍छी गाड़ी चलती है मैं आराम से बैठता हूं। पापा और मम्‍मी को भी अब ये भरोसा है कि मैं सड़क पर अच्‍छी गाड़ी चला लेती हूं उनकी तबीयत खराब होने पर भी मैं उन्‍हें तुरंत अस्‍पताल पहुंचा सकती हूं।

लोगों को साेच बदलने की जरूरत है कई बार ऐसा होता है लोग लड़कियों के गाड़ी चलाते देख कर हंसने लगते है। गाड़ी को ब्रेक लगा देते हैं, ऐसे रास्‍ता देते हैं जैसे ‘आप आगे चले जाओ मैडम, हमे मरना नहीं है।’ लोगों की सोच अभी भी नहीं बदली है कि लड़कियां सुरक्षित गा‍ड़ी चला सकती हैं। इस सोच में बदलाव की जरूरत है। मेरे जान पहचान में कई सारी लड़कियां ऐसी हैं जो वाहन चलाती हैं। भारत में केवल 1 फीसद लड़कियों से ही गलती से दुर्घटनाएं हो जातीं हैं। अक्‍सर परिवार में भी भेदभाव होता है। गा‍ड़ी लड़कियों के नाम से तो ली जाती है। लेकिन वो उन्‍हें चलाने नहीं दी जाती है। न ही परिवार के सदस्‍य उन्‍हें सिखाने में भी कोई ख्‍ाासी दिलचस्‍पी रखते हैं। अक्‍सर ये चीजें भी होती है कि घर में दो पहिया चार पहिया दोनों वाहन हैं तो परिवार के सदस्‍य ही कहेंगे दो पहिया से चले जाओ। उन्‍हें लगता है जैसे वाहन से दुर्घटना ही हो जाएगी।

दिल्‍ली में सखा नाम की स्‍वयंसेवी संस्‍था सखा महिलाओं चालकों को नौकरी उपलब्‍ध करवाती है। संस्‍था की कोमल का कहना है कि संस्‍था अब  तक 100 से अधिक महिलाओं को वाहन चालक की नौकरी दिलवा चुकी है। साथ ही सखा की कमर्शियल कैब सुविधा भी है। जो महिला चालकों के साथ लोगों को कैब उपलब्‍ध करवाती है। कोमल ने बताया कि वो लोग जो अपने परिवार की महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ज्‍यादा संवेदनशील होते वो हमसे संपर्क करते हैं। जिनके पास थोड़े ज्‍यादा पैसे हैं वह अपने घर की महिलाओं के लिए हमसे महिला कार चालकों की मांग करते हैं। हम आजाद फाउंडेशन नाम की संस्‍था से प्रशिक्षित महिला चालकों के लिए नौकरी दिलवाने का काम करते हैं।

आजाद फाउंडेशन महिलाओं को करीब एक साल का प्रशिक्षण देता है। जिसके बाद प्रशिक्षित महिलाएं सड़क पर पूरी जिम्‍मेदारी के साथ वाहन चलाने के लिए तैयार होतीं हैं। कोमल ने बताया कि अक्‍सर स्‍कूल कैब वगैरह में भी छोटी बच्‍िचयों से कैब चालकों की छेड़खानी जैसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं। ऐसे में महिला कैब चालक ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने में भी सक्षम हैं। सर्वे और घटनाओं के बाद भी सड़क पर महिलाओं की हिस्‍सेदारी बेहद कम सर्वे और दिल्‍ली यातायात पुलिस के आंकड़ों के अनुसार महिलाएं बेशक बेहतर चालक हैं बावजूद सड़कों पर उनकी हिस्‍सेदारी बेहद कम है।

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