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एक अकेली इस शहर में

मुजम्मिल

युवा अक्‍सर अपने भविष्‍य के सुनहरे सपने लिए छोटे बड़े गांवों कस्‍बों से दिल्‍ली जैसे महानगरों का रुख करते हैं। वो कई बार यहां बेहतर शिक्षा के लिए आते हैं तो कई बार बेहतर मौकों, माहौल और जॉब की तलाश में बड़े शहरों का रुख करते हैं। छोटे या दूसरे शहरों से आने वालों में अच्‍छी खासी तादात लड़कियों की भी है। ये लड़कियां कई बार अपने घरेलू हातालों से जूझ कर दिल्‍ली आती हैं तो कई बार भविष्‍य की सोच कर यहां रहने का फैसला लेती हैं।

घर छोड़कर दूसरे शहरों, महानगरों में आने, यहां रहने, पढ़ने, नौकरी करने या बसने की कोशिश का फैसला चाहे दिल्‍ली में अकेली रहने वाली इन लड़़कियों ने किन्‍हीं परिस्थितियों में लिया हो लेकिन इस फैसले से पीछे छूट जाता है उनका अपना परिवार, घरेलू कंर्फट जोन, घर का प्‍यार, दुलार, स्‍नेह, मां-बाप और उनके लिए परिवार के तमाम लोगों की फिक्र।

नया शहर दिल्‍ली और उसके आस-पास रहने वाली अकेली लड़कियों के लिए कदम कदम पर चुनौतियां खड़ी करता है। कई बार उनके धैर्य की परीक्षा लेता है तो कई बार उनके चयन के फैसले का इम्‍तिहान होता है।

ऐसा नहीं कि हर बार शहर में अकेली लड़कियों के हर फैसले सही ही होते हैं। कंक्रीट के इस शहर में अपने लिए एक कमरा तलाशने से लेकर दफ्तर या कॉलेज-कोचिंग जाने के बीच खाने का प्रबंध सब कुछ उनके अपने फैसलों पर निर्भर कर है। हमने यह जानने की कोशिश की उनके इन फैसलों में शहर उनका कितना साथ देता हैं।

लक्षिका वर्मा

गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके की रहने वाली लक्षिका वर्मा उत्‍तर प्रदेश के प्रयागराज से हैं। वो नोएडा की एक कंपनी में वो बतौर प्रबंधक काम करती हैं। लक्षिका ने बताया कि पिछले तीन सालों से पीजी में रह रही हैं। शहर में अपने मन माफिक मकान ढ़ूढना एक मुश्किल काम है। कई बार मकान मालिकों का रवैया किराए पर रहने वाली लड़कियों के प्रति ठीक नहीं होता तो कई बार उनके नियम कानून और प्रतिबंधों की वजह से उन्‍हें समय समय पर पीजी छोड़ना पड़ता है। लक्षिका का कहना कि इन इलाकों में कमरे का किराया बहुत ज्‍यादा है। इन्‍हें इतना कमर्शियलाइज कर दिया गया है कि यह एक संगठित लूट बन चुका है जो बाहर से अाए लोगों से जितने पैसे जिस तरह से लूट सको लूट लो वाली स्थिति बन गई है। इन इलाकों में मकान बिचौलियों के जरिए मिलते हैं। बिचौलिए किराए एक महीने का किराया बतौर ब्रोकरेज मांगते हैं, मकान मालिक एक महीने का किराया बतौर सिक्‍योरिटी और उस महीने के किराए की मांग करते हैं। ऐसे में यदि मकान का किराया यदि 10 हजार रुपए हैं तो जॉब के लिए या पढ़ने के लिए आई लड़की को तत्‍काल 30 हजार रुपए की जरूरत होगी। इसके अलावा भी कई तरह की परेशानियां उनके सामने आती हैं। जैसे बिजली का बिल और पानी का चार्ज। लक्षिका ने बताया कि वो 10 रुपए यूनिट के हिसाब से बिजली का बिल अदा करती हैं। उनकी पीजी दो बेडिंग वाला है। जिसे उन्‍हें किसी और के साथ शेयर करना पड़ता है। मकान मालिक कभी गीजर हटवा देते हैं तो कभी एअर कंडीशन के खराब होने पर हफ़तों ध्‍यान नहीं देते हैं। कई बार वो उनकी निजी जिंदगी में भी दखल की कोशिश करते हैं तो कई बार पेशेवर जिंदगी में घुसने की कोशिश करते हैं। पीजी में मिलने वाले खाने की क्‍वालिटी बेहद खराब होती है। जिसकी वहज उन्‍हें बहुत परेशानी होती है। लक्षिका चाहती हैं कि किराया और किराएदार दोनों को लेकर सरकार की ओर से एक पारदर्शी नीति बनाई जाए जिससे इतना बड़ा किराया उद्योग देश की अर्थव्‍यवस्‍था में भी योगदान करे।

साक्षी वर्मा

वहीं दूसरी ओर डीयू में पढ़़ने वाली  साक्षी बताती हैं कि वो 20 हजार रुपए बतौर किराए पीजी को अदा करती हैं। वो नॉर्थ कैम्‍पस के पास रहती हैं। 23 साल की साक्षी प्रयागराज से हैं। उन्‍हें लगता है कि 20 हजार रुपए अदा करने के बाद भी उन से जो पैसे लिए जा रहे हैं उसके मुकाबले उन्‍हें दोयम दर्जे की सुविधाएं और क्‍वालिटी परोसी जा रही है।साक्षी ने बताया कि वो टू सीटर कमरे में रहती हैं यानी उनके कमरे में दो लड़कियां रहती हैं। दोनों 20-20 हजार रुपए पीजी को देती हैं। इसमें बिजली बिल और खाने के साथ फल भी शामिल हैं। लेकिन फलों की क्‍वालिटी बेहद खराब होती है। दूध और दूसरी चीजों में पहले आओ पहले पाओ का नियम बना दिया गया है। कई बार क्‍लासेज की वजह से देर हो जाती है तब उन्‍हें पैसे देने के बाद भी उन्‍हें तय चीजें भी नहीं मिल पातीं हैं। साक्षी का कहना है कि उनके कमरे में यदि कोई इक्‍यूपमेंट जैसे स्‍वीच, पंखा, ऐसी आदि खराब हो जाते हैं तो उसे ठीक कराने के लिए 15-15 दिन तक इंतजार करना पड़ता है। राशिका की माने तो पीजी वाले नए बच्‍चों पर ज्‍यादा ध्‍यान देते हैं, पुराने और नए को दी जाने वाली सुविधाओं और गुणवत्‍ता में भी भेदभाव होता है। जैसे फलों की क्‍वालिटी बेहद खराब होती है।साक्षी कहती हैं पीजी या किराए में रहने वाले लोगों के लिए कोई ऐसी व्‍यवस्‍था जरूर होनी चाहिए जो उनकी ग्रेडिंग तय करे। किराए में रहने वाले लोगों की शिकायत पर उनकी समस्‍या की सुनवाई हो। सरकार का इंवॉल्‍वमेंट हो। वो चाहती हैं कि इसी आधार पर पीजी या उनके रेट या किराया तय हो जो वो सुविधाएं दे रहे हैं।

वैदेही राज

बिहार के नालंदा जिले से आकर नोएडा में रहने वाली वैदेही राज एक आइटी कंपनी में काम करती हैं। 25 साल की वैदेही बताती हैं कि नोएडा में 9 से 10 रुपए यूनिट बिजली का चार्ज तो लिया ही जाता है। लेकिन दूसरी वैदेही की मानें तो पैसों से जुड़ी समस्‍या एक तरफ हैं समस्‍या आस-पास के लोगों से भी होती है। लोग अकेली रहने वाली लड़कियों को गलत निगाह से ही देखते हैं। दफ्तर आने जाने के दौरान कॉलोनी या सोसायटी के लोगों की इन निगाहों का सामना करना बेहद मुश्‍िकल होता है। वैदेही बताती हैं कि इन नजरों के सवाल का जवाब उनके पास नहीं होता है। वो कहती हैं कि यदि आप पेशेवर तरीके से भी किसी से मिलते हैं या रात बिरात कोई आपको घर तक छोड़ जाता है तो भी लोग शक की निगाह से देखते हैं।

वैदेही की माने तो ऐसे में कमरा लेते वक्‍त बड़ी समस्‍या होती है। मकान मालिकों के सवाल जवाब कई बार चुभने वाले होते हैं। उन्‍हें लगता है कि हर लड़की गलत कामों में ही शामिल है। वैदेही बताती हैं कि कई बार प्रोफेशनल कारणों से आउट ऑफ सिटी भी जाना होता है लेकिन लड़की होने के नाते हम कई बाहर जाने से मना भी कर देते हैं। इसकी वहज ये है कि बाहर जाने पर मकान मालिकों के मन में शक बढ़ जाता है उन्‍हें लगता है कि फलां लड़की रात बिरात बाहर रहती है तो वो गलत ही कर रही होगी। ऐसे में इन सवालों से बचने के लिए हमें पेशेवर नुकसान होता है। दूसरी तरफ

 

आरती श्रीवास्‍तव

आरती श्रीवास्‍तव की मानें तो शहर में अकेली रहने वाली लड़कियों को आस पास के लोग हीन भावना से देखते हैं। साेसायटी को लगता है कि बंदी अकेली रह रही है तो जरूर कुछ कांड कर रही होगी। इन सबके पीछे पुरुष मानसिकता भी काम करती है। मगर ये जरूरी नहीं कि है कि जो लड़की अकेली रह रही है वो किसी के साथ भी कहीं चली जाएगी या वो इजी टू गो है। इसके लिए जरूरी है कि हम अपने आपको अपनी पर्सनालिटी को स्‍ट्रॉग बनाएं। आस-पास के दुकान वाले और आस पास रहने वाले लोगों से भी यदि आप हंस कर या थोड़ा खुलकर बात कर लो तो उन्‍हें भी लगता है कि को लगता है कि लड़की उनके साथ चली जाएगी। वो उनके साथ अजीब तरीके से पेश आने की कोशिश करने लगते हैं। हर लड़की जो किसी से खुलकर बात कर रही है इसका मतलब ये नहीं कि वो इजी टू गो हो सकती है। अक्‍सर लोगों की ये मानसिकता होती है, वो एप्रोच करते हैं। ऐसा नहीं है कि ये केवल आप जहां रहते हैं वहीं ये समस्‍या है। लड़कियों के सामने ऑफिस वगैरह में भी ये समस्‍या सामने आती है। आपके मेल फ्रेन्‍ड्स को भी लगता है कि लड़की अकेली है तो उससे दोस्‍ती बनाना और उसके साथ दूसरी तरह की चीजें करना आसान है। पहले वो आपको कॉफी के लिए बुलाते हैं। बाद में दोस्‍ती वगैरह के नाम पर शराब या वाइन की बात होती और कोशिश होती है कि वो लड़की उसके कमरे तक पहुंच जाए। आरती बिहार के बक्‍सर की हैं और बताती हैं कि ऐसी चीजों का सामना उन्‍हें भी अक्‍सर करना पड़ा लेकिन यहां जरूरत होती है कि वो खुद इस तरह से लोगों के सामने रखें कि वो इस तरह की कोशिश या सवाल ही न कर पाएं।

मैरी मंडल

मैरी मंडल लखीमपुरखीरी से हैं। वो साउथ एक्‍स में रहती हैं। मैरी ने बताया कि वह छह साल से घर से बाहर रह रही हैं। मैरी का कहना है कि दिल्‍ली जैसे शहर की जहां की लगभग 70 फीसद आबादी दूसरे शहरों से ही आकर रह रही वो किराए पर रहने वालों के साथ सौतेला व्‍यवहार करती है। लोग लड़कियों कमरा देने से पहले कई तरह के सवाल करते हैं। ये सवाल कई तरह के होते हैं। कई बार ये वाजिब भी होते हैं लेकिन ज्‍यादातर बार ये गैर वाजिब सवाल भी होते हैं। मैरी आइआइएमएम से पढ़ाई कर रही हैं। वो बताती हैं कि कई बार मकान मालिक आपसे आपकी जाति बिरादरी, आपके प्रोफेशन के बारे में पूछते हैं और मना कर देते हैं। अगर लड़की वर्किंग है तो मकान नहीं देंगे, पढ़ती हो मकान नहीं देंगे। रात में आएगी तो भी कमरा देने में आनाकानी करते हैं। आपके फोन कॉल और मेल फे्रंडस की जानकारी मांगते हैं। महत्‍तवपूर्ण बात ये है कि जब दिल्‍ली में 70 फीसद से ज्‍यादा आबादी बाहर के लोगों की है तो बाहर से आकर रहने वाली लड़कियों के प्रति ऐसा व्‍यवहार क्‍यों करते हैं। मैरी ने व्‍यकितगत तजुर्बा साझा करते हुए कहा कि कई बार दिल्‍ली के वो वाशिंदे जो यहां काफी पहले से रह रहे हैं उन्‍होंने यहां अपने मकान बना लिए वो लड़कियों को अक्‍सर डराने धमाने की कोशिश करते हैं। उन्‍हें लगता है कि लड़की अकेली रह रही है उसका आस पास कोई नहीं है तो मनमाना करने की कोशिश होती है। कई बार दरवाजा खोलने और जोर से बोलने किसी दोस्त के आने कमरे में पार्टी वगैरह करने पर भी घर से निकालने और सामान फेंकने आदि की धममी देते हैं। इसके अलावा कूड़ा फेंकने जैसी छोटी-छोटी बात पर घर खाली करने की धमकी देते हैं ऐसे में लड़का हो या लड़की दोनों के लिए मुश्‍िकल जो जाता है। वहीं आप अगर उनकी धमकी पर खुद नाराज हो कर खाली करने लगें तो वो सब चुप हो जाते हैं और मानाने लगते हैं।

इन सब के बीच अलीशा, वंदना, आक्क्षी, अभिलाशा, यामिनी, प्रिया और संगीता जैसी लड़कियों ने इस बेगाने शहर को अपना बनाने की कोशिश में अपने तलाश लिए है। कमरा तलाशने और मकान मालिकों के कायदों कानूनों के झंझावातों के बीच उन्होंने अपने जैसे उन बेगानों को ही अपना बनाकर जिंदगी जीना सीख लिया है। इन लड़कियों का कहना है कि ये शहर हर कदम पर उनके लिए चुनौतियां खड़ी करता है। लेकिन उन चुनौतियों के बीच खुशी के पल चुराने की कला आनी चाहिए। ये कहती हैं कि हमने अपने जैसों को अपना बना लिया है।

एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में

आब-ओ-दाना ढूँढता है, आशियाना ढूँढता है

बस दौड़ती फिरती रहती हैं, हम ने तो ठहरते देखा नहीं

इस अजनबी से शेहर में, जाना पहचाना ढूँढता है

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