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तमिलनाडु के उन किसानों ने एक बार भी ‘मुर्दाबाद’ के नारे नहीं लगाए- एक आम नागरिक की ग्राउंड रिपोर्ट

दिल्ली की चिलचिलाती धूप और मोटर गाड़ियों की चेंपें-चेंपें. जनपथ मैट्रो स्टेशन से निकल कर मैं जंतर मंतर की तरफ़ पैदल जा रहा था. बढ़ते क़दमों के साथ आँखें किसी बड़े जन सैलाब को ढूंढ रही थी. ढूंढ रही थी उन लोगों को जो क्रांति लाने में सक्षम है (केवल फेसबुक पर). किन्तु मैं पागल था. मुझे याद नहीं रहा के यहां मुद्दा धर्म से जुड़ा नहीं है. कोई बड़ा जन सैलाब तो नहीं पर वहां पहुँचते ही एक छोटी भीड़ ज़रूर दिखाई दी. रोड पर दो दरियां बिछीं थी और उन पर बैठे थे गाँधी जी के कुछ भक्त. अर्ध-नग्न अवस्था में कुछ किसान और उनको समर्थन देने आए आम लोग. भीड़ की गिनती बताना मुश्किल काम है; क्योंकि वहां कुछ नरमुंड भी थे. अब समझ नहीं आ रहा उन नरमुंडों को गिनती में शामिल करूँ या नहीं. वो निर्जीव नरमुंड ही तो आंदोलन का सबसे बड़ा हिस्सा थे न ?
सब किसानों के बीच किसानों का एक नेता, सोशल वर्कर और कुछ पत्रकार बैठे थे. नेता के तौर पर पेशे से एक वक़ील और किसान श्री पी. अय्याकन्नु मौजूद थे. पत्रकारों, सोशल वर्कर और अय्याकन्नु के बीच काफी देर तक चर्चा चलती रही. चर्चा के बीच एक बार अय्याकन्नु रो भी पड़े जिन्हें बाद में साथी किसानों ने चुप करवाया. भीड़ से अलग कुछ दूरी पर बारह-पंद्रह लोग बैठे थे. पास जाने पर पता चला के वो भी अपने स्तर पर किसानों की समस्या का हल निकालने की कोशिश कर रहे थे. एक व्यक्ति ने जहां अराजनीतिक किसान संगठन बनाने की सलाह दी तो दूसरे व्यक्ति ने एक संस्था बनाने को कहा जिससे बीच की दलाली खत्म हो और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल सके.
दोपहर एक बजे से लेकर शाम साढ़े छः बजे तक उस आंदोलन में मौजूद रहने से मैं उन किसानों के आँसू तो न गिन पाया पर जमीनी स्तर पर बहुत कुछ जान लिया था. एक-एक बारीकी न बताते हुए कुछ चीजें जरूर स्पष्ट करना चाहूँगा. तथाकथित देशभक्तों ने इस आंदोलन पर सवाल खड़े किये. भाजपा के राष्ट्रीय सचिव ने अय्याकन्नु को एक ट्वीट में फ्रॉड बताया.
सोशल मीडिया पर बैठे कुछ जजों ने इस आंदोलन पर जजमेंट देते हुए कहा कि ये लोग ‘तोंद’ वाले हैं, मिनरल वाटर और होटल का खाना खा रहे हैं इसलिए ये असली किसान हो ही नहीं सकते. क्या उनके ये आरोप अपने आप में सब कुछ बयान नहीं कर देते? अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने खुद कह दिया है कि भारत के किसानों की स्थिति आज ऐसी है कि किसानों मोटे तगड़े हो ही नहीं सकते, मिनरल वाटर या होटल से खाना ले ही नहीं सकते. दोपहर करीब दो बजे 20-22 साल का एक लड़का एक किसान से आके पूछता है कि मैं कुछ बिस्कुट लेके आया हूँ, बाँटने हैं तो किसान ने कहा कि अभी खाना बंटेगा, आप उसमे दे दीजियेगा.
अय्याकन्नु जब पत्रकारों से बात कर रहे थे तो इसी बीच एक आदमी उन्हें पानी की बोतल लाके देता है, जवाब में अय्याकन्नु कहते हैं कि “प्लीज़ खर्च न कीजिये, सादे पानी का इंतजाम भी हो जाएगा.” खाना बँटते वक़्त किसान जब लाइन में खड़े थे तो बाँटने वाले से मैंने पूछा के ये खाना कहाँ से आया है? जवाब मिला ‘बँगला साहिब’ गुरूद्वारे से खाना और आम लोगों से मिले बिस्कुट और पानी, ये हैं ग्राउंड रिपोर्ट.
उन्हीं किसानों के बीच एक ऐसा किसान भी था जो तीनों भाषाएं (तमिल, हिंदी और इंग्लिश) बोल लेता था। शरीर से सुडौल और भाषाओँ का ज्ञान, एक अंग्रेजी पत्रकार ने उस से पूछ लिया के आप किसान नहीं हो न? जवाब आया कि “मैं बैंगलोर से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, किसान नहीं पर इंसान हूँ.” पत्रकार के अगले सवाल का जवाब देते हुए उसने कहा कि यहां 4-5 लोग और ऐसे हैं जो पेशे से किसान नहीं हैं किंतु समर्थन देने के लिए आए हैं. ये किसान खुद ‘देसिया थेंनिन्थिया नाथिगल इनैप्पु विवसायिगल संगम’, ‘National South Indian Rivers Interlinking Agriculturist Association’ के मेंबर्स हैं.


गौर करने वाली बात वहां ये रही कि “तमिलनाडु के उन किसानों ने एक बार भी ‘मुर्दाबाद’ के नारे नहीं लगाए. या अंग्रेजी में कहूँ तो ‘curse’ नहीं किया. लोकल समर्थक आए और प्रधानमंत्री मुर्दाबाद के नारे लगे. हरियाणा से एक किसान संगठन आया और सरकार विरोधी नारे लगे किन्तु इन किसानों ने विरोध में नारे नहीं लगाए. खिलाफ कहने को उन्होंने बस इतना कहा कि कोई हमारी बात नहीं सुन रहा है, प्रधानमंत्री हमसे मिलने नहीं आए, चुनाव से पहले किया गया वादा पूरा नहीं आया. सवालों में सवाल अब ये उठता है कि उन किसानों ने आंदोलन से जुड़ा छुपाया क्या? जिन लोगों ने अपना शरीर नँगा कर दिया ताकि लोग उनकी हालत देख सकें, वो कुछ छुपाएंगे? ऐसा आंदोलन जिसमें किसी के विरोध में नारे नहीं लगे, वो किसी राजनीतिक एजेंडा पर आधारित हो सकता है?

खैर, वो किसान चले गए हैं. जाते-जाते एक आस लेकर गए हैं कि कुछ समाधान होगा. कुछ लेकर गए हैं तो बदले में कुछ दिया भी है. देकर गए हैं ज्ञान. ज्ञान कि आपकी फेसबुक-ट्विटर क्रांति धरी की धरी रह जाती है जब बात जमीनी स्तर पर आती है. ज्ञान कि जिन किसानों के नाम पर आप अपने स्वर्णिम इतिहास का राग गाते हो, वो राग दोगला है. ज्ञान कि भारत एक कृषि प्रधान देश तो है पर यहां ‘कृषि’ सड़कों पर चूहे खा रहा होता है और ‘प्रधान’ अपने कार्यालय में बैठा पड़ोसी देशों संग लूडो खेल रहा होता है। बाकी फिर भी अगर बात समझ न आए तो परसाई जी के कहे अनुसार आप लोगों का बौद्धिक संस्कार कर दीजिये. सिर खोलकर ये विचार उनके दिमाग में रखकर ताला लगा दीजिये और चाबी नागपुर गुरुजी के पास भेज दीजिये. न चाबी आएगी,न दिमाग खुलेगा, न परकीय और अराष्ट्रीय विचार उनके दिमाग में घुसें.

(उपरोक्त लेख  में व्यक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार है. इसे हमारे लिए रोहित शर्मा ने लिखा है. रोहित फिलहाल पेशे से स्वतंत्र लेखक है. दिल्ली में रहते है.)

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