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जादूई कोशिकाओं का मिलान जीनबंधु द्वारा जीवन का एक उपहार

नई दिल्ली। किसी ने सही कहा है कि जरूरत में जो साथ दे, वास्तव में वही सच्चा मित्र होता है। मेरे लिए जीनबंधु और जोरावर जी बिल्कुल वैसे ही हैं। यह कहना है 18 वर्षीय तेजवीर का। हिसार के रहने वाले तेजवीर को चार साल पहले एक्यूट लिंफोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल) बीमारी से ग्रस्त होने की बात पता चली। इस घातक बीमारी से लड़ने और उसका जीवन बचाने का एकमात्र समाधान बोन मैरो ट्रांसप्लांट था। वास्तव में भारत अप्रयुक्त जेनेटिक ज्ञान का कूप स्रोत है जहां इस अवधारणा के बारे में जागरूकता की कमी है। मज्जा (बोन मैरो) के ट्रांसप्लांट के लिए मानव ल्यूकोकाइट एंटिजेन (एचएलए) खोजना कोई चमत्कार से कम नहीं है जहां भारतीय जेनोटाइप के बहुत कम डेटा और मुट्ठीभर भारतीय रजिस्ट्रीज हैं। जीनबंधु नाम के एनजीओ ने इस विशेष क्षेत्र में विश्वसनीय डेटा को सफलतापूर्वक बनाए रखा है और पिछले कई वर्षों में स्वेच्छा से दान करने वालों की भर्ती कर एक स्टेम सेल रजिस्ट्री तैयार की है।

तेजवीर सिंह की महत्वाकांक्षा थी कि वह ओलंपिक में एक पहलवान के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व करे। दुर्भाग्य से उसके शरीर में इस घातक बीमारी का पता चला जो तब होता है जब मज्जा की एक कोशिका अपने डीएनए में गड़बड़ियां पैदा कर लेती है। उसके सपने, उसकी आंखों के सामने ही धूमिल होने लगे। परिवार के लोगों ने तेजवीर के लिए उसके मैच का मज्जा तलाशना शुरू किया, लेकिन उसके परिवार में किसी से उसका मज्जा मेल नहीं खाया। इस तरह से इस घातक बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय गैर रिश्तेदार डोनर से मज्जा का ट्रांसप्लांट था। परेशानी की इस घड़ी में डाक्टरों ने उसे आशा की एक किरण दिखाई। उन्हें जीनबंधु की रजिस्ट्री से मेल खाता मज्जा मिला और दान करने वाला भारतीय था। अपने व्यापक डेटाबेस के साथ जीनबंधु ने जोरावर सिंह को चिन्हित किया जोकि एक दिहाड़ी बढ़ई और तेजवीर का जेनेटिक मित्र था।

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