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महिलाओं के लिए कानून: कब और कैसे करें इस्तेमाल

महिलाएं हमारे समाज में आज भीअक्सर भेदभाव का शिकार होती हैं। उन्हें घरों के भीतर ही शारीरिक और मानसिक हिंसा झेलनी पड़ती है। महिलाओं को इस तरह के अत्याचारों से बचाने और इंसाफ दिलाने के लिए दहेज कानून (498 ए) और घरेलू हिंसा निरोधक कानून बनाए गए हैं। हालांकि कई बार 498 ए के बेजा इस्तेमाल के मामले भी सामने आते हैं। महिलाओं के हितों के लिए बनाए गए इन दोनों कानूनों का सही इस्तेमाल कैसे करें.

औरत के हक में…
दहेज के लिए पति या ससुराल पक्ष के किसी दूसरे शख्स के उत्पीड़न से महिला को बचाने के लिए 1986 में आईपीसी में सेक्शन 498-ए (दहेज कानून) शामिल किया गया। अगर महिला को दहेज के लिए शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या भावनात्मक रूप से परेशान किया जाता है तो वह दहेज कानून के तहत केस दर्ज करा सकती है। दहेज के लिए तंग करने के साथ-साथ क्रूरता और भरोसा तोड़ने को भी इसमें शामिल किया गया है। यह गंभीर और गैरजमानती अपराध है।

कब कर सकती है केस
दहेज के लिए अगर महिला का उत्पीड़न हो।
ऐसी क्रूरता, जिससे मानसिक और शारीरिक हानि हो सकती है।
शादी से पहले (रिश्ता तय होने के बाद), शादी के दौरान या शादी के बाद दहेज की मांग करने पर इस कानून के तहत मामला दर्ज कराया जा सकता है।

कहां करें शिकायत
क्राइम अगेंस्ट विमिन सेल के अलावा 100 नंबर या महिला हेल्पलाइन नंबर 1091 पर कभी भी (सातों दिन चौबीसों घंटे) कॉल कर या अपने इलाके के थाने में शिकायत की जा सकती है। दिल्ली में नानकपुरा के अलावा हर जिले में अलग से भी क्राइम अगेंस्ट विमिन सेल है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक दिल्ली लीगल सर्विस अथॉरिटी, राष्ट्रीय महिला आयोग, एनजीओ आदि की डेस्क क्राइम अगेंस्ट विमिन सेल में हैं। साथ ही विमिन सेल के पुलिस अधिकारियों खासकर महिला अधिकारियों को पूरी दिलचस्पी और धीरज के साथ पीड़िता की बात सुननी चाहिए ताकि वह खुलकर अपनी बात कह सके। शिकायत मिलने के बाद केस दर्ज करने से पहले पुलिस लड़के वालों को बुला लेती है। लेकिन अगर पति समझौता नहीं चाहता, न ही बातचीत करना चाहता है तो सीडब्ल्यूसी उसे हाजिर होने का प्रेशर नहीं डाल सकता। अगर दोनों पक्ष राजी हैं तो सीडब्ल्यूसी उनके बीच समझौता कराने की कोशिश करता है। जिन मामलों में लड़की या उसके घरवालों की इच्छा अलग होने की नहीं होती, वहां पुलिस की मध्यस्थता से काम हो जाता है। अगर मामला सुलझता नहीं है तो पति और उसके परिजनों के खिलाफ केस दर्ज किया जाता है।

कैसे होता है निपटान

आमतौर पर ऐसे मामलों को तीन चरणों में निपटाया जाता है :
1. काउंसलिंग : राष्ट्रीय महिला आयोग और कुछ एनजीओ आदि ने प्रफेशनल काउंसलर सीडब्ल्यूसी में नियुक्त किए हुए हैं। अगर महिला अपने पति के साथ रहना चाहती है और पुलिस को लगता है कि उसकी जान को कोई खतरा नहीं है तो उसकी और पति की काउंसलिंग के जरिए दोनों को साथ रहने के लिए तैयार किया जाता है। इसके लिए काउंसलिंग की जाती है। जरूरत पड़ने पर काउंसलर पीड़िता और आरोपी के घर भी जाते हैं। दोनों के बीच आगे की जिंदगी को लेकर कुछ बातें तय की जाती हैं।

2. मीडिएशन : दिल्ली लीगल सर्विसेज अथॉरिटी ने कानूनी सलाह के लिए महिला सेल में सीनियर वकील नियुक्त किए हैं। साथ ही, दिल्ली हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमिटी की देखरेख में दोनों पक्षों के बीच मीडिएशन की कोशिश की जाती है। गरीब या पिछड़े तबके की जो महिलाएं सिर्फ अपने सामान की वापसी के मकसद से आती हैं, उन्हें भी उनका हक यहां दिला दिया जाता है। काउंसलिंग फेल हो जाए तो कोर्ट की लंबी लड़ाई से बचाने के लिए मीडिएटर के जरिए शांतिपूर्ण तरीके से आपसी सहमति से अलग कराने की कोशिश होती है।
3. अदालत : बहुत से मामलों में अदालत की कोशिश भी सुलह की होती है। नाकाम होने पर शांतिपूर्ण ढंग से अलग होने को प्रॉयरिटी दी जाती है। मामला नहीं बनता तो पूरी अदालती प्रक्रिया होती है।

 

सबूत रखें
पति या ससुराल वालों के सताने पर चुप न रहें। जान लें, आपको उतना ही सताया जाएगा, जितना आप सहनकरना चाहेंगी।
अपने पैरंट्स, परिवार के बाकी लोगों, दोस्तों आदि को उत्पीड़न और पूरे मामले की जानकारी दें। लेटर, ई-मेल या एसएमएस के जरिए अपने परिवार, दोस्तों या रिश्तेदारों से संपर्क साधें। ऐसे ई-मेल या एसएमएस डिलीट न करें।
अगर उनसे संपर्क नहीं कर सकतीं तो ससुराल के पड़ोसियों को खुद पर हो रहे अत्याचार की जानकारी दें।
जरूरत पड़ने पर पुलिस से संपर्क करें। यह बिल्कुल न सोचें कि इससे रिश्ता टूटेगा क्योंकि आपकी चुप्पी घातक हो सकती है।
शादी में जो कुछ भी पैसा खर्च हुआ है, उसकी रसीद संभालकर रखें।
अगर मारपीट की गई है तो सरकारी अस्पताल में जाकर मेडिकल कराएं और रिपोर्ट संभालकर अपने पास रखें।
100 और महिला हेल्पलाइन नंबर 1091 को अपने मोबाइल में स्पीड डायल पर रखें। परेशानी होने पर फौरन कॉल करें।

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