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मैं खुद को उस समाज का हिस्सा मानती हूं

मुजम्मिल

मैं खुद को उस समाज का हिस्सा मानती हूं जिस समाज में सामान्य लोग रहते हैं लेकिन ये सामान्‍य लोगों का समाज हमें स्वीकार नहीं करता है। मैं शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के समाज का हिस्सा नहीं बनना चाहती हूं लेकिन वो समाज मुझे अपना सा लगता है। वहां हम एक दूसरे बात सुनते हैं समझते हैं यहां  समस्याएं एक जैसी होती हैं? लेकिन सक्षम लोगों का समूह हमें हमेशा ये एहसास करता है कि हम उनके समूह का हिस्सा नहीं। ये पीड़ा है दिल्ली विश्वविद्यालय की फिलॉसफी की सहायक प्रोफसर सर्मिष्ठा की। सर्मिष्ठा को रेटीनाइसिस पिग्मेंटोसा नाम की आंख की बीमारी है। वो जन्म से आंखों से अक्षम तो नहीं थीं लेकिन समय के साथ उनकी आंखों की पुतलियां प्रकाश के प्रति असंवेदनशील होती चली गर्इं। इसी के साथ उन्होंने यह भी महसूस किया सामान्य लोगों वाला सभ्य समाज भी उनकी अक्षमताओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता खोता चला गया।

सर्मिष्ठा कहती हैं मैं जन्म से अंधी नहीं थी (वो अंधे शब्द का प्रयोग बेहिचक करतीं हैं, कहती हैं मैं देख नहीं सकती अंधापन मेरी अक्षमता है), मैंने लोगों को वो इशारे करते महसूस किया हैं तब मेरी आंखें हरकतें पहचानती थीं ये लोग मुझे अक्षम साबित करने पर तुले थे, मैंने कॉलेज और टीनएज में लोगों के उस मजाक से भी गुजरी हूं जो मेरी आंखों में आंखें डाल कर आइ लव यू करने की शर्त लगाते थे। क्योंकि उन्हें पता था कि मेरी आंखें किसी चेहरे को पहचान नहीं सकती थीं लेकिन दिल सब कुछ समझता था। उस दौरान मुझे भी सजने संवरने का बहुत शौक था, रंग बिरंगे कपड़े पहनती थी, खुद को यूं सजाती थी कि लोग मुझे अंधी न समझें, खुद को उस समाज से दूर रहने की कोशिश करती थी जो खुद को विकालांग कहते हैं लेकिन समान ने मेरी अक्षमता मुझ पर थोपी दी।

सर्मिष्ठा कहती हैं यही हाल आज भी मेरे आस पास है। आज मैं कॉलेज की सहायक प्रोफेसर हूं लेकिन सक्षम लोगों का समूह मुझे आज भी अपना हिस्सा मानने को तैयार नहीं है। वो कहती हैं कि मैं शुक्रगुजार हूं अपने देश के कानून का कि उसने मुझे इस मुकाम तक पहुंचने में मदद की लेकिन वहीं मैं अपने ही लोगों से निराश हूं जो मुझे बात-बात पर ये साबित करना चाहते हैं कि मैं अक्षम हूं। सर्मिष्ठा की आवाज भारी हो जाती हैं, शायद उनकी आंखों की संवेदनशीलता बढ़ जाती है, वो खुद को संभलती है। वो कहती हैं मीटिंग के दौरान चपरासी मुझे चाय देकर जाता है लेकिन वो चाय पड़ी-पड़ी ठंडी हो जाती है। बगल बैठा मेरा सहकर्मी मुझे नहीं बताता कि सर्मिष्ठा तुम्हारी चाय ठंडी हो रही है। खाने की चीजें मेरे लिए भी आतीं है लेकिन मैं खा नहीं पाती वो यूं ही पड़ी रह जाती है, यहां बात खाने की नहीं, बात बगल बैठे सहकर्मी की संवेदनशीलता की है। अच्छा है मेरी आंखें अब चेहरा नहीं देख पातीं वर्ना बहुत खूबसूरत चेहरों की गंदी तस्वीर देखती। किसी मीटिंग के दौरान जब यह कहा जाता है कि आप में से किसी को कुछ कहना है, मैं हाथ उठाती हूं लेकिन वो हाथ हवा में ही रह जाता है।सर्मिष्ठा कहती हैं यहां लोग आपके लिए रीडिंग भी निस्वार्थ नहीं करते।

सर्मिष्ठा कहती हैं कि मैं आज मैं खुद को सफल मानती हूं लेकिन मैं वो नहीं जो मैं बनना चाहती थी, मैं वो बनी जो मेरी मां बनाना चाहती थीं। सर्मिष्ठा ने बताया कि उन्हें गाने का शौक था, लेकिन लोग मेरे गाने को नहीं सुन रहे होते थे मेरी आंखें देख रहे होते थे। मैं गाने की ओर उनका ध्यान ले जाना चाहती थी लेकिन उनका ध्यान आंखों पर होता था। इसलिए मैंने गाना छोड़ दिया। मुझे रेटीनाइसिस पिग्मेंटोसा है। शारीरिक रूप से अक्षम लोगों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके आस-पास की सोसायटी उसे कितना मदद करती है और वे अक्षमताओं के प्रति कितने जागरूक हैं। मेरी स्कूलिंग पटना के शारदा विद्या मंदिर से हुई, जहां मेरी अक्षमताओं को लेकर प्रधानाध्यापक मोहन चतुर्वेदी संवेदनशील थे। दोस्तों का सहयोग मिला, वो मुझे बोल कर पढ़ाते थे अभिभावकों और भाई बहनों का बड़ा योगदान होता है।

जिनकी वजह से आज मैं यहां पहुंचने में सफल हो सकी। लेकिन समाज में जागरूकता का अभाव है। नेहा बताती हैं कि राष्टÑीय पात्रता परीक्षा के दौरान वहां के लोगों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि अक्षम लोगों को 20 मिनट अतिरिक्त दिए जाते हैं। उन्हें इस बात की चिंता थी कि सरे बच्चे जा चुके हैं और उन्हें घर जाना है। मैं वहां अपने अधिकारों के लिए भी लड़ रही थी और पेपर भी दे रही थी।

सक्षम लोगों का हमारा समाज अक्सर हमें खुद से अलग करने की कोशिश करता है। वो अक्षमताओं को चैरिटेबल समझते हैं जबकि उन्हें अधिकार के रूप में समझना चाहिए। अक्षमताएं तो किसी घटना पर भी हो सकती है। यह टेम्परोरी फेनोमेना है। दिवाली, दशहरे पर लोग अक्षम बच्चों के लिए चैरिटी करते हैं। उन्हें दान की जरूरत नहीं, उन्हें उस सामान्य लोगों के समाज से जोड़ने की जरूरत है। उन्हें सक्षम लोगों से बात करने में परेशानी होती है वो उनके साथ समन्यव स्थापित नहीं कर पाते हैं।

हमारी मांग शुरू से रही है कि जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं सरकार उनकी सुविधाओं का ध्यान रखे लेकिन सरकारी स्तर जिन पर प्राथमिक स्तर पर ध्यान देने  वाली चीजें ही पूरी नहीं की जा पा रही हैं। जैसे रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, बसें आॅटो रिक्शा और मेट्रो आदि दूसरी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में शारीरिक अक्षमताओं वाले लोगों का ध्यान नहीं दिया गया है। हम डिजिटल इंडिया में रह रहे हैं बैंकिंग सर्विस में भी उनके लिए सरकारी स्तर पर बहुत कमियां हैं। जैसे एटीएम में व्हील चेयर लेकर नहीं जाया जा सकता। यूरोपीय देशों में इसपर ध्यान दिया है लेकिन भारत में अब तक संभव नहीं हो सकता है। एपल और एंड्रायड फोन ने अक्षम लोगों के लिए बहुत काम किया है वहीं विंडोज ने इस उतना काम नहीं किया।

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