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सैन्य रणनीति
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सैन्य रणनीति पर बजता खुला ढ़ोल

किसी भी देश की सैन्य व्यवस्था की सुदृढ़ता कई तथ्यों पर निर्भर करती है। उसमें से एक महत्वपूर्ण पहलू है उसका आंतरिक नियंत्रण और सैन्य कार्यवाही की गुप्तता। जब भी कोई आतंकी हमला हो या सीमा पर कोई घुसपैठ,सेना अपनी कार्यवाही करती है जिसके कई गुप्त तरीके और नीतियां होती है। जो आम जनता के सामने नही रखी जाती पर टीवी चैनल्स का बढ़ता आयाम कही ना कही इस गुप्त परत को छेदता नजर आता है। आज चैनल्स पर ना केवल सैन्य बलों की युद्ध क्षमता का मापदंड होता है बल्कि उनके युद्ध आयुध और हथियारों पर खुली चर्चा भी एक आम बात है।

सेना की कार्यवाही को लाइव दिखाने का अंजाम 26/11 के मुंबई हमले में सामने आ चुका है। जिसमे मीडिया खबर प्रसारण कुछ इस तरह था की वो सेना की हर ठिकाने और स्थिति से कही ना कही आतंकियों को अवगत करा रहे थे। जिसके पश्चात् सुप्रीम कोर्ट ने चैनल्स पर नकेल कसी और लाइव सैन्य कार्यवाही दिखाने पर रोक लगाई। ऐसी ही कुछ स्थिति पठानकोट एयरबेस पर आंतकी हमले के समय थी। टीवी चैनल पर सेना की पोजीशन देख कही ना कही पाकिस्तान से आंतकी मुख्या से उन्हें दिशा निर्देश मिल रहे जो की सेना के लिए काफी समस्या खड़ा करने वाला था। विषम परिस्थितयों में टीवी एंकर्स का बीच में सवाल जवाब कही ना कही सैन्य कार्यवाही में मुश्किलें खड़ी करता है।

सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा हो या पठानकोट एयरबेस कैम्प पर आतंकी हमला, उसमे सैन्य कार्यवाही इस तरह से चैनल पर दिखाना ना केवल सेना को एक आम मुद्दा बनाना है बल्कि आम जनता के बीच मे उनकी आंतरिक व्यवस्था को सरेआम करना है। इसके कई घातक परिणाम भी हो सकते है। आतंकी संगठन जहां इन तथ्यों के आधार पर अपनी गतिविधियों को अंजाम दे सकते है तो वहीं दुश्मन देश, सेना की युद्ध क्षमता का आंकलन कर उस अनुरूप युद्ध नीति का निर्माण कर सकते है।

आतंकी हमले हो या सीमा पर कोई हलचल टीवी चैनल्स को पूरा हक है कि वो सही खबर को सामने रखे। पर सेना की रणनीति और युद्ध सामर्थ्य पक्ष को इस तरह आम खबर ना बनाएं। देश की सुरक्षा व्यवस्था और नीतियाँ काफी गोपनीय होती है जो अपने दायरे में ढकी रहे तो और सुदृढ़ हो जाती है इन्हें सरेआम करना अपने आप में सैन्य कार्यवाही को एक आम बात बनाना है।

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