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जब प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे सपा सुप्रीमो मुलायम यादव!

मुजम्मिल

लालू-मुलायम के चार दशक पुराने रिश्ते में पहले तल्खी नजर आती थी। लालू-मुलायम की सियासत में तल्खी का ये पन्ना गठबंधन राजनीति के उस दौर से जुड़ा हुआ है जब मुलायम सिंह दो बार देश के प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए। ये मानने वालों की कमी नहीं है कि उस समय मुलायम सिंह की साइकिल को पंचर करने में लालू प्रसाद यादव की ही प्रमुख भूमिका थी।

70 के दशक में ये दोनों ही नेता जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकल कर देश की सियासत में छा गए। दोनों ही खुद को राम मनोहर लोहिया का शागिर्द बताने में फख्र करते हैं। दोनों ही पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की सियासत के लिए जाने जाते हैं। यादव और मुस्लिम वोट के सहारे दोनों ही नेताओं ने अपने-अपने सूबे पर लंबे वक्त तक राज किया है।

लेकिन दोनों की सियासत की ये समानता कभी भी उन्हें गहरा दोस्त नहीं बना सकी। हकीकत ये है कि एक जैसी सियासत की वजह से ही दोनों नेता लंबे वक्त तक एक दूसरे से होड़ करते रहे। हालांकि ये होड़ अब थम जाएगी, जब दोनों एक दूसरे के समधी बन जाएंगे।

हालांकि लालू और मुलायम का वो अतीत हमेशा उनके साथ रहेगा जिसकी वजह से मुलायम के दिल में ये मलाल रहा है कि लालू प्रसाद यादव ने उन्हें देश का प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया।

1996 और 1999 में कम से कम दो बार ऐसे मौके आए हैं जब मुलायम प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए। कहते हैं दोनों ही बार प्रधानमंत्री बनने के उनके ख्वाब को तोड़ने में लालू प्रसाद यादव का अहम किरदार रहा।मुलायम सिंह यादव ने लालू प्रसाद को लेकर अपनी नाराजगी छुपाई भी नहीं है।

एक बार मुलायम ने बयान दिया था कि जिन चार लोगों ने मुझे प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया, वो हैं लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, चंद्र बाबू नायडू और वीपी सिंह।सियासत के इस नन्हे नेपोलियन के पीएम बनने का पहला मौका तब आया था जब 1996 के चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई। इसी चुनाव में बीजेपी की 161 सीटें आईं थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार बनाने का राष्ट्रपति का न्यौता स्वीकार कर लिया था, लेकिन बहुमत न जुटा पाने की वजह से सिर्फ 13 ही दिन में उनकी सरकार गिर गई थी।

1996 में कर्नाटक के किसान नेता एचडी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे। उनकी सरकार में मुलायम सिंह यादव रक्षामंत्री थे। ये गठबंधन के सियासी दौर की शुरुआत थी और लालू और मुलायम दोनों ही प्रधानमंत्री पद के लिए एक दूसरे के खिलाफ खड़े थे। मगर चारा घोटाले में नाम आने की वजह से लालू का पत्ता कट गया। उस वक्त मुलायम का दामन पाक-साफ था।

उनका नाम वाम नेता हरकिशन सिंह सुरजीत आगे बढ़ा रहे थे। लिहाजा वाम मोर्चा भी सहमत था, लेकिन कहते हैं कि लालू के विरोध की वजह से उनका नाम फाइनल नहीं हो सका था। अब वही लालू मुलायम सिंह के समधी होने जा रहे हैं, और खुशी के इस मौके पर दोनों ही पुरानी बात भुला देना चाहते हैं।खुशी के मौके पर आरजेडी नेता प्रेमचंद पुरानी बात को मजाक कह कर टाल देना चाहते हैं, लेकिन दूसरी बार ये मजाक 1999 में फिर हुआ, जब लालू ने ही मुलायम की साइकिल की हवा निकाल दी थी।

दरअसल, सीताराम केसरी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस ने 21 अप्रैल 1997 में देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। हरकिशन सिंह सुरजीत ने एक बार फिर मुलायम का नाम आगे बढ़ाया था। 13 दलों वाले संयुक्त मोर्चे में मुलायम के नाम पर सहमति बनने लगी थी। लेकिन शरद यादव, चंद्र बाबू नायडू और लालू ने फिर अड़ंगा लगा दिया और इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बन गए।

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