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नन्ही आंखों की हिफाजत

हमारे सबसे खास और नाजुक अंगों में से होती हैं आंखें। अगर इनका ख्याल न रखा जाए तो छोटी-सी परेशानी जिंदगी भर की तकलीफ बन सकती है। छोटे बच्चों की आंखें ज्यादा संवेदनशील होती हैं, इसलिए उन्हें लेकर ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।

 आंख का इन्फेक्शन
नवजात बच्चों में जन्म के तीन से चार हफ्ते के अंदर जन्मजात इन्फेक्शन हो सकता है, जिसे ऑफ्थैलमिया नियोनेटोरम कहते हैं। यह बच्चे के जन्म के समय होने वाली लापरवाही के कारण होता है। बच्चे की आंख से पानी आना, आंख का चिपकना, आंख की पलकों पर सूजन आना, आंख का लाल होना इसके लक्षण हो सकते हैं। ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी-बायॉटिक आई ड्रॉप डालने और आंख की सफाई रखने से यह इन्फेक्शन ठीक हो जाता है। दो से तीन दिन में ठीक न होने पर आंखों के डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

आंख की पुतली (कॉर्निया) का इन्फेक्शन
आंख के बीच में गोलाकार काले रंग का दिखने वाला भाग कॉर्निया कहलाता है। यह पारदर्शी होता है। इसमें इन्फेक्शन होने पर इसकी पारदर्शिता खत्म हो जाती है और इसके पीछे आइरिस दिखाई नहीं पड़ती। आंख की पुतली पर इन्फेक्शन आंख के लिए घातक होता है। इसमें आंख में दर्द, आंख का चिपकना और लाल होने जैसी शिकायतें हो सकती हैं। इस स्थिति में फौरन ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी-बायॉटिक्स आई ड्रॉप डालनी शुरू कर देनी चाहिए और डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। कॉर्निया का इन्फेक्शन गंभीर समस्या है। इसमें देरी करने पर आंख की पुतली पर घाव होने की आशंका रहती है। बच्चे की आंख की रोशनी जाने का खतरा भी रहता है।

आंसू की नली बंद होना
आंख के अंदर से आंसू की एक नली नाक के नीचे के हिस्से में खुलती है। इस नली को नेजोलेक्राइमल डक्ट कहते हैं। इस नली के द्वारा आंख में लगातार बनने वाले आंसू नाक के रास्ते से गले में लगातार जाते रहते हैं। जब यह नली बंद हो जाती है, तो बच्चे की आंख से लगातार पानी बाहर गिरता रहता है, जिससे आंख में इन्फेक्शन की आशंका बढ़ जाती है और आंख चिपकने लगती है। कंजंक्टिवाइटिस बीमारी जल्दी-जल्दी होने लगती है।

यह बीमारी आमतौर पर जन्म के एक हफ्ते बाद देखने को मिलती है। इसमें बच्चे की नाक के दोनों तरफ दिन में तीन से चार बार आंसू की नली के ऊपर मालिश करते हैं और ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी-बायॉटिक आई ड्रॉप का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा करने पर ज्यादातर बच्चों में यह समस्या ठीक हो जाती। तीन-चार महीने में जिन बच्चों में यह समस्या ठीक नहीं होती है, उनका एक छोटा-सा ऑपरेशन होता है, जिससे यह नली खुल जाती है। यह जन्मजात बीमारी है।

पैदा होने के बाद पहले महीने में बच्चों में आंसू नहीं बनते इसलिए इस बीमारी का पता तीसरे महीने के पास आते-आते ही लगता है, जब आंसू बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह एक कॉमन समस्या है और जन्म के समय करीब 20 फीसदी बच्चों में यह पाई जाती है।

जन्मजात मोतियाबिंद (कैटरैक्ट)
जन्मजात मोतियाबिंद बच्चे में जन्म के समय से होता है। ऐसा गर्भावस्था के समय मां के खान-पान में कमी, मां में गर्भावस्था के समय रूबेला नामक वायरस का इंफेक्शन, गर्भावस्था में मां का कुछ दवाओं का सेवन जैसे स्टेरॉयड (Dexamethasone, Betamethasone, जेनरिक नाम) और रेडिएशन (गर्भावस्था के दौरान एक्स-रे) आदि इसके प्रमुख कारण हैं।

मां अगर गर्भावस्था के दौरान इन चीजों से बचाव करे तो बच्चे को जन्मजात मोतियाबिंद से बचाया जा सकता है। इसमें बच्चे की आंख की पुतली के बीच में सफेद रिफ्लेक्स दिखाई पड़ता है। जन्मजात मोतियाबिंद होने पर डॉक्टर बच्चे की आंख की रोशनी की जांच करते हैं। अगर मोतियाबिंद आंख के पूरे लेंस में है, तो जल्द-से-जल्द मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना जरूरी है। ऐसा न करने पर आंख में एम्बलायोपिया होने की आशंका रहती है, जिसमें आंख के पर्दे पर पाया जाने वाला मेक्यूला डल हो जाता है।

मेक्यूला लगातार रोशनी पड़ते रहने से स्टिमुलेट रहता है और ठीक से काम करता है। मेक्यूला पर रोशनी न पड़ने से वह काम करना कम कर देता है। चार-छह महीने की देरी होने पर एम्बलायोपिया हो सकता है और ऐसा होने पर मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद भी बच्चे में पूरी दृष्टि आने की संभावना कम हो जाती है और कई बार एम्बलायोपिया का इलाज करना आंख के डॉक्टर के लिए बहुत मुश्किल होता है। इसलिए समय रहते जन्मजात मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना जरूरी है। अगर जन्मजात मोतियाबिंद आंख के पूरे लेंस में नहीं है और बच्चे की आंख की रोशनी पर असर नहीं डाल रहा है, तो ऐसी स्थिति में कई बार ऑपरेशन की जरूरत नहीं भी पड़ती।

जन्मजात काला मोतिया
काला मोतिया जन्मजात भी होता है। इसे इन्फैंटाइल ग्लूकोमा भी कहते है। इसमें आंख का ड्रेनेज सिस्टम ठीक नहीं होता। इसकी वजह से आंख की रोशनी का जो नुकसान हो गया, उसे पूरा नहीं किया जा सकता, बस इस बीमारी को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है। इसमें आंख से पानी आने लगता है। रोशनी में आंख को चौंध लगने लगती है। बच्चे की आंख का आकार बड़ा हो जाता है।

आमतौर पर आंख का आकार 11 मिमी के करीब होता है लेकिन इस स्थिति में आंख का आकार बढ़कर 15 मिमी तक हो जाता है। ऐसा कोई भी लक्षण दिखाई दे तो फौरन डॉक्टर के पास जाएं। शुरू में डॉक्टर दवाओं से ठीक करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अगर इससे फायदा नहीं होता तो ऑपरेशन करते हैं। ऑपरेशन बेहद छोटे बच्चों का भी कर दिया जाता है, जो पूरी तरह सेफ है।

जन्मजात भैंगापन
भैंगेपन में बच्चे की आंख अंदर या बाहर की तरफ भागने लगती है। कई बार एक आंख में और कई बार दोनों आंखों में भैंगापन पाया जाता है। भैंगापन होने पर बच्चे की नजर की जांच कराना जरूरी है। भैंगापन शुरुआती स्थिति में आंख पर कोई बुरा असर नहीं डालता, लेकिन इसमें एक आंख जो तिरछी है, वह धीरे-धीरे सुस्त होती जाती है और उसकी नजर कम होने लगती है।

आम आदमी भी इसे देखकर पहचान सकता है। इसकी कई वजह हो सकती हैं। कई बार बच्चों को चश्मे की जरूरत होती है और वे चश्मा नहीं लगाते। इससे भैंगापन हो सकता है। कई बार जन्म के समय आंख पर पड़ने वाले प्रेशर की वजह से भी भैंगापन हो सकता है इसलिए डिलिवरी के वक्त खास ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

अगर भैंगापन ज्यादा है तो डॉक्टर की सलाह लें और दवा डालकर पूरा चेकअप कराएं। कई मामलों में भैंगापन सिर्फ चश्मा लगाना शुरू करने से ही ठीक हो जाता है, लेकिन कई बार कोऑर्डिनेशन की कमी से होने वाले भैंगापन का इलाज सर्जरी से किया जाता है। बच्चों के स्कूल जाने से पहले ही यह इलाज करा लेना चाहिए। आठ साल की उम्र के बाद इसका इलाज होना मुश्किल होता है।

रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी
समय से पहले जन्मे और कम वजन के बच्चों में यह समस्या देखने को मिलती है। गर्भावस्था में बच्चे की आंख का विकास तीसरे ट्राइमेस्टर में होता है। जो बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं, उनमें आंख का पूरा विकास नही हो पाता। ऐसे बच्चों के आंख के पर्दे में नई और अविकसित खून की नालियां बनने लगती हैं, जिससे कई बार आंख के पर्दे पर खून उतरने और पर्दे के खिसकने की आशंका रहती है। यह बीमारी आंख की रोशनी के लिए घातक है। बच्चे के आंख के पर्दे की समय-समय पर आंखों के डॉक्टर से जांच कराते रहें। इस स्थिति में लेजर द्वारा समय से इलाज कराकर बच्चे की नजर बचाई जा सकती है।

स्टाई (आंख में फुंसी)
आंख की पलकों में पाई जाने वाले जिईज ग्लैंड्स में इन्फेक्शन के कारण हुई सूजन को आंख की फुंसी कहते हैं। वैसे तो स्टाई किसी भी उम्र में हो सकती है लेकिन बच्चों में ज्यादा देखने को मिलती है। जिन बच्चों में दृष्टि दोष होता है, जो बच्चे आंख रगड़ते हैं, जिनकी आंख की पलकों पर रूसी रहती है और जिन लोगों को डायबीटीज हो, उनमें स्टाई ज्यादा होती है।

कमजोर और मीठा ज्यादा खाने वाले बच्चों में भी स्टाई ज्यादा निकलती हैं। स्टाई होने पर आंख में दर्द, आंख से पानी जाना, पलकों पर सूजन और रोशनी में चौंध लगना जैसे लक्षण हो सकते हैं। स्टाई होने पर गर्म पानी में स्टरलाइज्ड रुई डालकर उससे आंख की दिन में दो से तीन बार सिकाई करनी चाहिए। आंख में तीन से चार बार ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी-बायॉटिक आई ड्रॉप डालनी चाहिए। आंख की सफाई का ध्यान रखना चाहिए। दो से तीन दिन में आराम न मिलने पर डॉक्टर को दिखाएं।

ध्यान रखें:-
जांच जरूरी
भारती ग्रुप ऑफ आई हॉस्पिटल्स के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. एस. भारती के मुताबिक, बच्चे के जन्म के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज होने से पहले ही एक बार उसकी आंखें किसी आई सर्जन से चेक करा लेनी चाहिए। इससे कोई भी जन्मजात परेशानी पकड़ में आ जाती है। अगर ऐसा नहीं करा पाए हैं तो बच्चे के स्कूल शुरू करने से पहले यानी तीन साढ़े तीन साल की उम्र में आंखों की पूरी जांच जरूर करा लें।

अगर बच्चे की नजर कमजोर निकलती है तो उसे हर समय सही नंबर का चश्मा पहनना चाहिए। कई बार लोग बच्चों को इसलिए चश्मा नहीं पहनने देते क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे बच्चे की आंखें कहीं और ज्यादा कमजोर न हो जाएं। यह गलतफहमी है। चश्मे की जरूरत है तो बच्चों को उसे लगातार पहनना चाहिए। साल में एक बार आंखों की जांच जरूर कराते रहना चाहिए।

दवाएं
-नवजात बच्चों को विटामिन-ए की खुराक जरूर पिलवाएं। विटामिन-ए की कमी से बच्चों में रतौंधी हो सकती है।

-आंख में अगर कोई बीमारी नहीं है, तो कोई दवा नहीं डालनी चाहिए। बीमारी होने पर दवा सिर्फ डॉक्टर की सलाह से ही डालनी चाहिए। एक बार आई ड्रॉप खुलने के बाद एक महीने तक ठीक रहती हैं। इसके बाद उस खुली हुई आई ड्रॉप का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

-आंख में काजल, सुरमा, शहद आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। काजल, सुरमा में कार्बन के कण होते हैं, जो कॉर्निया और कंजंक्टाइवा पर खरोंच डाल सकते हैं। आंख में शहद डालने पर शहद आंसुओं के साथ मिलकर बैक्टीरिया, वायरस और फंगस बढ़ाता है, जिससे आंख में इन्फेक्शन फैल सकता है।

आई ड्रॉप्स
ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी-बायॉटिक आई ड्रॉप्स में प्रमुख हैं:- सिप्रोफ्लॉक्सासिन (Ciprofloxacin), ऑफ्लॉक्सासिन (Ofloxacin),गैटिफ्लॉक्सासिन (Gatifloxacin),स्पारफ्लॉक्सासिन (Sparfloxacin) आदि। ये जेनरिक नाम हैं और अलग-अलग ब्रैंड नामों से मार्केट में मिलती हैं। हालांकि इन नामों से भी मेडिकल स्टोर पर मांगने पर ये दवाएं मिलजाती हैं। दवा दिन में तीन से चार बार एक- एक बूंद डालनी चाहिए।

योग और एक्सरसाइज
योग गुरु डॉक्टर सुरक्षित गोस्वामी के मुताबिक, बच्चे आंखों की सूक्ष्म क्रियाएं रोजाना करें। इसके लिए आंखों को दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं। इसके बाद बड़ा सर्कल बनाते हुए आंखों को क्लॉकवाइज और ऐंटी-क्लॉकवाइज दोनों दिशाओं में घुमाना चाहिए। कपालभाति आंखों के लिए बहुत अच्छा है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम भी करें।

सूक्ष्म क्रियाएं किसी कुशल योग टीचर की देखरेख में 4 साल की उम्र के बाद शुरू करा सकते हैं, जबकि प्राणायाम की शुरुआत के लिए 6-8 साल की उम्र ठीक मानी जाती है। दिन में दो से तीन बार आंखों को साफ पानी से धोना चाहिए। आंख खोलकर सीधे आंख में छपाके नहीं मारने चाहिए। ऐसा करने से कॉर्निया पर चोट लग सकती है। बादाम खाना भी आंखों के लिए अच्छा है। रात को चार-पांच बादाम भिगो दें। सुबह उठकर खा लें। साथ में 3-4 देगी मिर्च का चूर्ण, गाय के घी, मिश्री के साथ मिलाकर खाएं। आंखों की कमजोरी नहीं होगी।

कुछ और टिप्स
-विटामिन से भरपूर खाना खाएं, जैसे दूध, हरी सब्जी, मौसमी फल आदि।

-बच्चों को फास्ट फूड कम-से-कम देना चाहिए क्योंकि फास्ट फूड की न्यूट्रिशस वैल्यू कम होती है।

-बच्चों को स्वीमिंग पूल में नहीं भेजना चाहिए। स्वीमिंग पूल से इन्फेक्शन एक से दूसरे में आसानी से लग जाता है।

-लेटकर नहीं पढ़ना चाहिए। बच्चों को ऐसा करने से रोकें।

-पढ़ने के कमरे में रोशनी का ठीक इंतजाम होना चाहिए।

-जो बच्चे कॉन्टैक्ट लेंस पहनते हैं, उन्हें लेंस के रखरखाव का खास ध्यान रखना चाहिए। जैसे लेंस पहनते और उतारते वक्त हाथों को साबुन और साफ पानी से धोकर साफ तौलिए से पोंछना चाहिए।

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