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…तो इन्हें हैं घोड़े-कुत्ते पालने का अजीब शौक, वजह बेहद रोचक!

 

 

नई दिल्ली। वैसे तो राजस्थान सहित देशभर में नागौरी नस्ल के बैलों के कारण प्रसिद्ध श्री रामदेव पशु मेले का आगाज कुछ दिनों पहले ही हो चूका है, पर जो अजीबोगरीब बातें है बताने जा रहें हैं उसे जानकर आप अचंभित हो जाएंगे।

अचंभित होना भी लाजमी हैं क्योंकि इस मेले में एक ऐसा परिवार हैं जो अपने  घोड़े और पालतू कुत्तों की लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है।

इस मेले में आनेवाले हर व्यक्ति की नजर इनके ऊपर जरुर पड़ती हैं और ये एक बार तो जरुर इनके पास रुकते हैं और देखकर जाते है कि यहां भीड़ क्यों लगी और क्या रोचक है?

इस परिवार के लगाए टैंट के पास जाते ही पता चलता है कि यहां लोगों की भीड़ क्यों लगी है। दरअसल, टैंट के ऊपर इस परिवार ने एक बोर्ड लगा रखा है, जिसमें मारवाड़ी में एक स्लोगन लिखा है कि ‘देख भलांई, बेचू कौनी’, यानि वे मेले में पशुओं को बेचने के लिए नहीं लेकर पहुंचे हैं, बस अपने ठाठ-बाट दिखाने के लिए पशुओं को लेकर आए हैं।

इस परिवार के इस बड़े शौक को इस मेले में आ रहा हर व्यक्ति एक बार जरूर देखता है। जब इस परिवार के मालिक नागौर निवासी कैशाराम से बात कि तो उन्हें हिंदी समझ नहीं आई। मारवाड़ी में बात की तो वे तपाक से बोल पड़े शौक रूपी लेकर आए हैं।

कैशाराम ने बताया कि उसके पूर्वज भी घोड़े रखते थे। एक घोड़े की कीमत पांच तो दूसरे की चार लाख रुपए है। मेले में वे पिछले कई साल से आ रहे हैं।

कैशाराम ने बताया कि उन्होंने बोर्ड लगा रखा है, जिसमें लिखा है देख भलांई, बेचू कौनी। उसके बेटे-पोते भी घोड़े और कुत्तों को पालने का ही काम करते हैं। घर में 15 से 20 घोड़े-कुत्ते हैं।

कैशाराम ने कहा कि वे घोड़ों और कुत्तों को पालने के लिए प्रत्येक महीने एक लाख से डेढ़ लाख रुपए खर्च करते हैं। कैशाराम ने पूर्वजों के इस शौक को अपनाया है और हम पशुओं की सेवा अपने बेटों के जैसे करते हैं।

मेले में आने का शौक है, इसलिए हर साल मेले में आते हैं। हम पशुओं को नहीं बेचते हैं। अगर यहां उन्हें कोई अच्छा घोड़ा नजर आता है और सही कीमत पर मिलता है तो खरीद लेते हैं।

इस रोचक परिवार के पास कई ऐसे लोग भी आते हैं, जिन्हें घोड़ों का शौक है। वे घोड़े की अच्छी नस्ल और देखभाल के चलते खरीद की कोशिश करते हैं।

About RITESH KUMAR

Senior Correspondent at khabarondemand.com. Love to follow Politics, Sports and Culture.

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