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UP Elections 2017: वोटिंग के थर्ड फेज में कौन आएगा फर्स्ट?

लखनऊ। सरकार किसकी बन रही है?… फरवरी के महीने में इस सवाल का जवाब 20 करोड़ लोग तलाश रहे है। परिक्षाएं सर पर है स्कूली बच्चों की, पर असली इम्तिहान तो नेताओं का चल रहा है। सवाल सूबे की सत्ता का जो है। वो भी अपने उत्तर प्रदेश की. जनाब। यहां का सीएम मिनी पीएम की हैसियत रखता है! तीसरे चरण के मतदान को लेकर सभी दल आश्वस्त है? टीवी और अखबार तो यहीं बता रहें है। फिर भी अकेले में बात करने पर नेता भी मानते है कि ‘भाईसाहब हवा टाइट है,  क्या बताए आपको, बड़ा ही तगड़ा मुकाबला है, चुनौती देने वाला और ललकारने वाला, दोनो ही हैंडपंप की तरह है। जितना बाहर, उससे कहीं गुना जमीन के अंदर’ सो सब गप्पबाजी है!

क्या कहता है तीसरे चरण का चुनाव?

तीसरे चरण में वोट डालेगा उत्तर प्रदेश का दिल । लखनऊ, कानपुर, इटावा, मैनपुरी,उन्नाव। ये जिले प्रदेश की सत्ता का केंद्र है। यहां के नेता सरकार, संगठन में सीधी धमक रखते है। इटावा से ही सपा का उदय हुआ। नेताजी की तैयार अखाड़े में अब अखिलेश यादव को दंगल लड़ना है। जब मैं मैनपुरियों के बीच गया, तो वहां मैंने सियासी चर्चा में दो पीढ़ियों के बीच अपने वर्चस्व का टकराव महसूस किया। लोग अभी भी सपा के साथ खड़े है, पर हाल ही में यादव परिवार में जो कुछ हुआ, उसने पार्टी को अंदर तक झकझोर जरूर दिया है।

युवा सपाई अखिलेश यादव के साथ पूरी ताकत से खड़े है, तो मुलायमवादी चचा लोगों का कहना है कि नेताजी का आदेश ही आखिरी है। अब उन्होंने अखिलेश यादव का समर्थन कर दिया है तो हम भी तैयार है, फिर से सरकार बनाने के लिए लिए। वहीं यादव परिवार के किले में सेंधमारी को आतुर कमलधारियों की माने तो इस बार मोदी फीवर 2014 वाले शबाब पर है और इतिहास बनने जा रहा है।

कनपुरियों के दिल में क्या है ?

वैसे तो कानपुर में पंजा और कमल ही रंगबाजी करते रहे है। अब 2017 में यूपी के लड़के साथ आ गए है, सो कमलवाले जरा टेंशन में दिखाई दे रहे है। शहर की किदवई नगर विधानसभा, सीसीमऊ विधानसभा, कल्याणपुर विधानसभा पहले से भी गठबंधन के पास है, और इस बार भी पाला मौजूदा विधायकों का ही भारी दिखाई पड़ता दिख रहा है। आर्यनगर विधानसभा से बीजेपी के सलिल विश्नोई खतरे में है। पिछले 30 सालों से ये सीट बीजेपी के खाते में है, इस लिए आराम के साथ-साथ दवाब भी सबसे ज्यादा है! एक तो पार्टी और विधायक के करीबी खुल कर हरवाने में लगे हैं, तो दूसरी ओर सपा के प्रत्याशी अमिताब वाजपेयी पिछले चुनाव के हिसाब से चुनाव जीतते दिखाई दे रहे है। कैंट विधानसभा में 55 फीसदी वोटर मुस्लिम है, अगर उन्होंने इस बार एकमत होकर वोट कर दिया तो सीट बीजेपी से गई समझो।

राजधानी में साइकिल की रफ्तार इस बार कैसी?

साल 2012 के चुनाव में लखनऊ में साइकिल खूब दौड़ी थी। सिर्फ 1 सीट पर कमल खिला था। अभी यहां पर गठबंधन के पास 9 सीटें है। नफासत से इस शहर में लोग मुख्यमंत्री के किए विकासकार्यों पर जमकर मुस्कुराहट बिखेर रहे है। आप लखनऊ में आएंगे तो लगेगा ही नहीं कि ये यूपी का शहर है । रिवर फ्रंट से लेकर जनेश्वर पार्क तक लोग आनंद लेते नजर आए। काम भी जोरदार हुआ है, जिसे विरोधी भी दबी जुबान से स्वीकार करते है। फिर भी इस बार बड़े नेताओं के पाला बदलने से दिलचस्पी और बढ़ गई है।

लखनऊ कैंट में लड़ाई कांग्रेसी से नई भाजपाई बनी रीता बहुगुणा जोशी और यादव परिवार की बहू अपर्णा यादव के बीच है। जातिय समीकरण जोशी के पक्ष में भले ही हो, पर बीजेपी की अंदरूनी खींचतान और अपर्णा यादव की दमदार शख्सियत और मासूमियत भारी पड़ जाए तो अचरज नहीं होगा। सरोजनी नगर सीट पर मौजूदा विधायक और मंत्री शारदा शुक्ला को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। वो आरएलडी से उम्मीदवार है। यहां मुख्यमंत्री के करीबी कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव लड़ रहे आनुराग भदौरिया भी गंभीर उम्मीदवारी पेश कर रहे है। लखनऊ मध्य में वोटर बीजेपी के बाहरी उम्मीदवार बृजेश पाठक के पक्ष में तो नहीं है, लेकिन गठबंधन के दो प्रत्याशी होने की वजह से कन्फ्यूजन का फायदा उन्हें मिल सकता है।

(मोहित चोपड़ा युवा पत्रकार हैं। राजनीतिक मामलों की अच्छी समझ रखते हैं। मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश के सभी हिस्सों में घूम घूम कर आम मतदाताओं की नब्ज़ टटोल रहे हैं, साथी ही राजनीतिक दलों की चुनावी गतिविधियों पर बारीक नजर रख रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चुनावी समर पर यह लेख उनके विश्लेषण का एक हिस्सा मात्र हैं।)

नोट: लेख में व्यक्ति विचार लेखक के अपने हैं। खबर ऑन डिमांड के संपादक मंडल का सहमत होना अनिवार्य नहीं है।)

 

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