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खाकी का दर्द ना जाने कोई! यह भी तो पूछो-आखिरी बार नींद भरकर कब सोए थे?

पुलिस! हां हां वही… ठुल्ले, रिश्वतखोर, अपने मां-बाप के भी सगे नहीं, भ्रष्ट, खाकी से ना दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी….! और ना जाने क्या-क्या हम इन्हें कहते रहते हैं और हमारी खाकी! बस इसकी तो बात ही निराली है कितनी भी आलोचना कर लो लेकिन जब आफत आती है तो ईश्वर के बाद खाकी को ही हम आप याद करते हैं। लेकिन एक छोटी सी गलती अगर हमारा कोई भी खाकीधारी कर दे तो समझ लीजिए कि उसने आतंकवादी से भी बड़ा गुनाह कर दिया है।

सोशल मीडिया पर पुलिस के खिलाफ कुछ ज्यादा ही खबरे वायरल हो रही हैं। कभी 100 -200 की रिश्वत के लिए तो कभी छोटी-मोटी गलती के लिए। आप शराब पिएं तो अच्छा है लेकिन कोई खाकीधारी अगर गलती से भी शराब पी ले चाहे वह किसी चिंता में, घरेलू परेशानी में या अपने सीनियर की फटकार से दुखी एक पैग लगा लेता है तो कथित समाजसेवी सामने आ जाते हैं। उससे बड़ी हद तब हो जाती है जब मीडिया में ‘नशे में झूमती खाकी’, ‘पब्लिक त्रस्त, पुलिस पीकर मस्त’ जैसे हेडलाइन के साथ खबरे चलानी लगती है।

एक और खबर कुछ इसी तरह का वायरल हो रहा है। वायरल खबर में हमारा खाकीधारी वाहन पर ही सोते हुए दिख रहे हैं। बस उनका सोना या पलक झपकाना ही सबसे बड़ा गुनाह हो गया है। उनके पलक झपकाते मात्र से ही हाहाकार मच गया। सब उथल-पुथल हो गया। कई हत्याएं हो गईं, भारी संख्या में लूटपाट की घटनाएं घटित हो गईं।

अगर ऐसा नहीं हुआ है तो हल्ला किस बात का। एक थानाध्यक्ष सुबह 4 बजे सोता है दिन-रात वह ड्यूटी करता है। सुबह 6 बजे फिर उठ जाता है तब कोई उसका शुक्रिया नहीं अदा करता। लेकिन गलती से भी ड्यूटी पर उसने झपकी ले ली तो हमारा समाज उन्हें पता नहीं क्या क्या कहता है। जैसे कि सोने के पैसे ले रहे हैं आदि-आदि।

मैं यहां पर कोई आंकड़ा नहीं दूंगा लेकिन सिर्फ छोटी-छोटी जानकारियां जरूर साझा करना चाहूंगा। एक आईपीएस अधिकारी 14-14 घंटे काम करते हैं। एक थानाध्यक्ष सुबह 4 बजे सोता है और 6 बजे फिर से उसपर आफत आ जाती है और वह ड्यूटी पर निकल लेता है। कुछ ऐसा ही हाल उसके साथियों का भी रहता है।

खासकर उस साथी का जो थानाध्यक्ष का वाहन चालक रहता है। कंधे पर गन हाथ में स्टेयरिंग और थानाध्यक्ष के साथ-साथ गलियों, सड़कों की धूल फांकते रहता है। खाना मिल गया तो खा लिया नहीं तो लंच करने के लिए इन्हें समय शाम को करीब 4 बजे मिलता है। वीआईपी मूवमेंट हुआ तो भगवान ही मालिक। एक थाने में जितने पुलिसकर्मी होते हैं उससे कही ज्यादा अपराध प्रतिदिन होते हैं। लेकिन आपका क्या आपने तो 100 नंबर पर पुलिस को सूचना दे दी अब वो बेचारे अगर लेट पहुंचते हैं तो आप उन्हें गालिया देते हो! ऐसा क्यों?

सामाज का नागरिक होने के नाते आपके पास भी यह अधिकारी है कि आप अपने आस-पास हो रही घटनाओं को रोकने की कोशिश करें लेकिन उसके लिए आप पुलिस को बुलाते हो क्यों? शायद इसलिए कि आपकी जान ज्यादा कीमती है। गुंडो, बदमाशों से आप लड़ना नहीं चाहोगे क्योंकि आप सभ्य हो वहीं अगर बदमाशों से लड़ते-लड़ते कोई पुलिसकर्मी शहीद होता है तो उसकी आपको चिंता नहीं होती। उसके बीवी बच्चों का आपको जरा सा भी ध्यान नहीं रहता।

नोट: इस लेख को शैलेंद्र शुक्ल ने लिखा है। यह लेखक का निजी विचार है। किसी भी प्रकार की आपत्ति के लिए shailendra1990shukla@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं अथवा लेखक से फेसबुक के माध्यम से भी सम्पर्क कर अपनी बात रख सकते हैं।

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