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गांधी और गोडसे दो व्यक्ति नहीं बल्कि दो विचार

 

30 जनवरी, 1948 को अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी 70 साल पहले हिंसा के शिकार हो गए। अंग्रेजों की गुलामी से भारत को मुक्ति दिलाने के महासंग्राम में मोहनदास करमचंद गांधी ने अहम भूमिका निभाई। अंतिम समय में हिंसा का शिकार होकर भी उन्होंने अहिंसा का साथ नहीं छोड़ा उनके मुख से जो अंतिम शब्द निकले वो थे ‘हे राम’!

दिल्ली के उर्दू घर गांधी और गोडसे पर  एक प्ले हुआ ‘गांधी एक असंमभव संभावना”कलाकारों की जीवंत प्रस्तुति देख दर्शकों से खूब वाहवाही मिली। कार्यक्रम में दिल्ली के कलाकारों ने प्रस्तुति दी। बता दे की कोई भी कलाकार प्रोफेशनल नही हैं,फिर भी सभी कलाकारों ने काफी उम्दा एक्टिंग किया।नाट्य मंचन रात 7 बजे शुरु हुआ। आयोजन स्थल उर्दू घर भीड़ से खचाखच भरा रहा। इस मौके पर प्ले राईटर प्रोड्यूसर सुमन कुमार,पदमश्री प्रोफेसर अखतारुल मुजफ्फर हुसैन सईद,सुरेश माथुर,एडवाइजर तरक्की हिंद, मोहम्मद आरिफ खान,डॉक्टर टीए सिददीकी, सईद अहमद इडिटर इन चीफ वेव बाईता,जावेद राहमानी,मिडिया कोर्डिनेटर अनजुमन तरक्की उर्दू हिंद,जमारुद मुगल, इकराम मिरजा उपस्थित थे।

लोगों को जागरूक करना उद्देश्य निर्देशक प्ले राईटर प्रोड्यूसर सुमन कुमार ने बताया कि नाटक मंचन का उद्देश्य लोगों को जागरूक करना है। उन्होंने नाटक के माध्यम से बताया कि गांधी और गोडसे दो व्यक्ति नहीं बल्कि दो विचार हैं। उनके बीच के द्वंद-अंर्तद्वंद्व ही नाटक की कथावस्तु है। असगर वजाहत ने काल्पनिक परिस्थिति निर्मित कर नाटक का विस्तार किया। परिस्थितियां मनुष्य के नियंत्रण से बाहर होती है। व्यक्ति अपने विचार के लिए स्वतंत्र है, लेकिन किसी की हत्या की स्वतंत्रता नहीं। न ही अपने अस्तित्व को समाप्त करने की। लोग अपनी कुंठा को शांत करने के लिए अनुचित रास्ता अख्तियार करते हैं।  उद्देश्य चाहे कितना भी महान क्यों न हो, अगर विचार दूषित व साधन अनुचित हो, तो परिणाम निकृष्ट होगा।

आज थिएटर न सिर्फ अभिनय की कला को निखार रहा है बल्कि एक ऐसा माध्यम बन गया है जो समाज को एक बेहतर और सरल तरीके से जागरूक कर रहा है। इस मे तकनीक जैसे इंटरनेट और सोशल मीडिया का भी बहुत महत्व एवं योगदान है।

गोडसे के भाई गोपाल दास गोडसे ने एक किताब लिखी जिसका नाम है ‘मैनें गांधी को क्यों मारा?’  गोपाल गोडसे ने अपनी किताब में दब गांधी के पुत्र देवदास गोडसे से मिलने जेल पहुंचे थए तो लिखा है, ‘देवदास (गांधी के पुत्र) शायद इस उम्मीद में आए होंगे कि उन्हें कोई वीभत्स चेहरे वाला, गांधी के खून का प्यासा कातिल नजर आएगा, लेकिन नाथूराम सहज और सौम्य थे। उनका आत्म विश्वास बना हुआ था। देवदास ने जैसा सोचा होगा, उससे एकदम उलट।’

नाथूराम ‘राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ’ का सदस्य रहा था और गांधी की हत्या करने के चलते उसे 15 नवम्बर 1949 को फांसी दी गई। भले ही नाथूराम ने गांधी का हत्या की थी लेकिन इससे पहले वो उनके विचारों से प्रभावित था। नाथू का खुद कहना था कि आजादी की लड़ाई में सावरकर के बाद गांधी जी के ही विचारों ने मुल्क को आजाद कराया है। लेकिन इसके बाद भी नाथू गांधी की हत्या का कारण क्यों बना इस पर अलग कहानी है। नाथू का कहना था कि वो गांधी से प्रेरित था लेकिन उन्होंने देश का बंटवारे में अहम भूमिका निभाई और मुस्लमानों का साथ दिया और इसके एवज में उन्होंने ना जाने कितने ही हिंदू भेंट चढ़ गए। वास्तव में नाथू गांधी की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से नफरत करता था जोकि शायद संघ की विचारधारा को सुहाती नही थी इसलिए उसने प्रेरित होकर गांधी की हत्या की।

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