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आम आदमी को लगेगा झटका, 93 पैसे प्रति यूनिट की दर से महंगी हो सकती है बिजली

आम आदमी को आने वाले दिनों में झटका लग सकता है. पावर कंपनियां बिजली के दाम बढ़ा सकती हैं. दरअसल, कर्ज के बोझ तले दबी देश की बिजली उत्पादक कंपनियों ने पर्यावरण मंत्रालय के दिशानिर्देशों को पालन करने में सरकार की मदद मांगी है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सरकारी और प्राइवेट बिजली उत्पादक कंपनियों ने कोयला आधारित पुराने प्लांट्स में तकनीक को अपग्रेड करने से होने वाले खर्च में मदद के लिए सरकार से गुहार लगाई है. नई गाइडलाइंस के मुताबिक कंपनियों को बिजली उत्पादन में होने वाले पॉल्यूशन लेवल को कम करने के लिए पुराने प्लांट को तकनीकी रूप से अपग्रेड (रेट्रो फिटिंग) करना है.

कंपनी ने मदद की लगाई गुहार

सूत्रों के मुताबिक, कंपनियों ने सरकार से गुजारिश की है ग्रीन सेस के तौर पर बने फंड के कुछ हिस्से का इस्तेमाल रेट्रोफिटिंग पर आने वाले खर्च के रूप में किया जाए. सूत्रों के मुताबिक, पावर मिनिस्ट्री इस मसले पर वित्त मंत्रालय से संपर्क करेगी. दरअसल सरकार कोयले पर ग्रीन सेस के रूप में प्रति क्विंटल 400 रुपए लेती है.

बढ़ सकते हैं बिजली के दाम

दरअसल, पावर प्लांटों के तकनीक को अपग्रेड करने से बिजली कंपनियों की इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी होगी. बिजली उत्पादक कंपनियां पहले से ही कर्ज के भारी बोझ तले दबी हैं ऐसे में माना जा रहा है कि लागत बढ़ने से उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं. सरकार ने संसद में भी बयान दिया है कि नए गाइडलाइंस की वजह से इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी होगी और बिजली के दाम प्रति यूनिट के हिसाब से 93 पैसे तक बढ़ सकते हैं. जाहिर है अगर बिजली के दाम बढ़ते है तो आम कंज्युमर की मुश्किलें भी बढ़ेंगी.

क्या रणनीति बना रही है सरकार

माना जा रहा है कि करीब 300 प्लांट का फौरी तौर पर रेट्रो फिटिंग किया जाना है. हालांकि, सरकार 25 साल से पुराने प्लांट के रेट्रोफिटिंग के पक्ष में नहीं है. सूत्रों के मुताबिक, सरकार पुराने प्लांट की रेट्रोफिटिंग के बजाए सुपरक्रिटिक्ल टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करना चाहती है. लेकिन, अपेक्षाकृत कम पुराने प्लांट के लिए ठोस रणनीति बनाने की दरकार है ताकि पावर सेक्टर पर भी बोझ न पड़े और बिजली के दामों को कंट्रोल करने में मदद मिले.

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