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व्यँग : Up Election 2017 – समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई

लेखक अतुल कुमार राय

एक थे बैजू पांड़े..जिला बलिया के रँगबाज..छह फिट के छरहर जवान, धरती दबा के आ सीना फुलाके जब चलते थे तो गाँव-जवार के लोग उनको चार सौ मीटर दूर से ही प्रणाम करते थे..माई-बाप के अकेले थे,खेत-बारी भी गाँव भर में सबसे ज्यादा थी..बाबूजी छेदी पांड़े गाँव के प्राइमरी स्कूल में मास्टर थे..भगवान नें सब कुछ करेजा फार के दिया था..बैजू माई बाप के दूलरुआ लइका थे..कोई बोलता, डांटता-डपटता नहीं था..

एक बार संयोग से अपने मामा यहां कलकत्ता गए गए…आ दूई महीना में पान-बीड़ी,सिगरेट-गांजा,महुआ-रम, आदि में प्रशिक्षित होकर पियक्कड़ की मानद उपाधि लिए लौटे…गाँव आए तो छेदी पांड़े को बड़ा दुःख हुआ..”सरवा हम आज तक एक पान नहीं खाए..अउर इ दारु क शीशी तोड़ने लगा.”

किसी समझदार ने समझाइस दिया..”देखो.अभी थोड़ा सा बिगड़ा है..बियाह कर दो..मेहरारू के हाथ का भात-फुलौरा खाएगा लाइन पर आ जाएगा.”
बियाह होने लगा..कुछ ही दिन में पता चला तिलकहरू दीवाल खोन के चार काठा खाल कर दिए हैं..’भाई मास्टर साहेब का जिला जवार में नाम..उनका इकलौता बेटा.इतनी बड़ी सम्पत्ति का अकेला वारिश..’
लीजिये..बैजू पांड़े क बियाह तय हो गया..बियाह के दिन गाजा-बाजा बजा..दान दहेज भी खूब मिला..सिया-सुकुमारी जइसन कनिया भी आ गयी..
दू-चार साल तक घर-गृहस्थी ठीक ठाक चला..दुर्भाग्य से बैजू पांड़े के बाबूजी मास्टर साहेब स्वर्ग सिधार गए..

बाबूजी क्या मरे. बैजू छूटा सांड़ की तरह फिरी हो गए..ठिकेदारी से लेकर नेतागीरी में मन रमनें लगा..election भी लड़ने लगे..दारू की भट्ठी से प्रमोशन करते हुए मीना बाजार अउर गुदरी बाजार तक आने-जाने लगे..अउर कुछ ही साल में प्रमोशन पर प्रमोशन करते हुए अईसा जाने लगे दीना पांड़े का सारा जमीन जायदाद जात-इज्जत प्रतिष्ठा का चूल्हि में लवना लगा दिए..
कुछ साल अइसे ही चला.. एक लाचार मेहरारु थी..और एक अठारह साल का बदनसीब बेटा..दारु के चक्कर में खेत पर खेत बिक रहा था..

तीन साल पहले की बात है.पांड़े जी के मेहरारू को लकवा मार दिया..हुआ दिक्कत..अब खाना-पीना कौन बनाएगा. हाय ! रे करम.. ! डीह बाबा…काली माई..

तक किसी ने कहा कि बबलूआ का बियाह कर दिया जाए..बीस साल का होइये रहा है.
गाँव में हुआ हल्ला.. अरे ! इस पियक्कड़ के घर में बियाह कौन करेगा जी..किसकी बेटी का करम फूटा है..

कुछ लोग-बाग़ बबलू बाबू के लिए दुलहिन खोजने लगे.कुछ लोग बियाह काटने लगे.

एक साल खोजे,दू साल,तीन साल.. जब कहीं सेटिंग नही हुई तो बैजू पांड़े का नशा चटका..सदमा लगा..
कोई उनके बेटे को पूछ नहीं रहा है..

संयोग से पिछले साल गाँव-जवार के नामीं अगुआ तिलेसर पांड़े आए..जमाना जानता है कि तिलेसर पांड़े कौआ आ हंस का बियाह करा देंगे ई तो बबलू बाबू हैं..बैजू पांड़े की उम्मीदें जवान होकर लहर लेने लगीं..
तिलेसर पांड़े ने बैजू पांड़े के कान में मंत्र मारा.
“भयवा हम बियाह तो करा देंगे..का दोगे हमें..”?
बैजू पांड़े कहे..”जेतना दहेज मिलेगा.”उसमें से आधा ले लेना..बाकी बाजा बजवा दो.ना तो पाँड़े जी मास्टर साहेब के खानदान का नाव डूब जाएगा..”
अब क्या हुआ अगुवा तिलेसर पांड़े गंगा पार से तिलकहरु बुलाया..आ सभके सामने कहना शुरू किया .

“अरे साहेब..लइका त एकदम हीरा है.एकदम गाय है…बाप से आजतक तेज आवाज में बात नहीं किया.बस इसका बाप गड़बड़ है..उहे बदमाश है..उ बदमाश नहीं होता तो लइका आज कहीं डीएम कलैक्टर होता..ऊ ससुरा पियक्कड़ इसे पढ़ने ही नहीं दिया..

वरना ई आज कहाँ से कहाँ गया होता..”
तीलकहरु भड़का..”बक महराज..ऊ सब तो ठीक है…लेकिन ये उन्हीं का न लड़का है..केतना सीधा होगा.. ? पता चला कुछ साल बाद इहो अपने बाबूजी..जईसा ?
अगुआ कहे….”अरे महराज..एकदम्मे सीधा लइका है..?

आपको लड़के से बियाह करना है की उसके बाप आ खानदान से.. आँय” ?

भगवान का छोह देखिये पिछले साल लगन में पता चला है कि अगुआ तिलेसर पांड़े कामयाब हो गए हैं.. पियक्कड़ बैजू पांडे को दोषी ठहराके उनके बबलुआ के हाड़े हरदी लग गया.बाजा बज गया.
अब लीजिये इस बार गाँव गया था तो पता चला कि बबलू बाबू दारु पीकर अपने मेहरारू आ बाबूजी दुनू को मार लाठी मार लउर मार दिए हैं..मेहरारू नइहर भाग गयी है…अउर माई मरने के कगार पर हैं..

आज सुबह-सुबह ये कहानी यूँ ही नहीं याद आ रही..
आज जब सोशल मीडिया से लेकर अखबार,के पन्नों को पलट रहा था तब ये बैजू पांड़े की जगह मोलायम सिंह और बबलू बाबू की जगह अखिलेश यादव..

और अगुआ तिलेसर पांड़े की जगह उन पीआर एजेंसीओं की बड़ी याद आ रही थी..
सोच रहा था जनता कितनी मूर्ख है न ?..एकदम बबलू बाबू के तिलकहरु टाइप..
वो इन तिलेसर पांड़े के छद्म जाल के आगे एक छन में भूल गयी..

जब पांच साल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहर दंगों से जूझते रहे.. गाँव शुद्ध चार घण्टा बिजली के लिए तरसते रहे… सड़क,बिजली,स्वास्थ्य,जैसी मूलभूत सुविधाओं के भगवान ही मालिक थे..

शिक्षा..आहा ! हाय रे समाजवाद..

2012 के अध्यापकों की भर्तियां आज तक नहीं हुईं..लाखों विद्यार्थियों की कापियां परीक्षक के बाद कोर्ट के चक्कर आज भी लगा रहीं हैं..

इधर न जाने कितने लाख गरीब विद्यार्थी न जानें कहाँ से चन्दा जुटाके कोर्ट और विधानसभा एक करके लाठियां खाते रहे,हाय ! धरना देते रहे..जान देते रहे..उधर फलाना आयोग से लेकर चिलाना आयोग के सचिव यादो जी दस-दस लाख लेकर भर्तियां करते रहे..

मल्लिका शेरावत और मलाइका अरोड़ा के ठुमकों पर समाजवाद नाँचता रहा..Laptop पर Laptop और smart Phone बंटता रहा उधर थाना-पुलिस प्रशासन में गुंडों की तूती बोलती रही..

शासन से लेकर प्रशासन थाना से लेकर ब्लॉक और पुरस्कार से लेकर तिरस्कार तक.सारा समाजवाद जातिवाद में तब्दील रहा..

उस समय कहाँ थे आपके बबलू बाबू. ? एक्को शब्द नहीं बोले..”कहो छेदी ई का कर रहे हो..”?
काश बबलू बाबू ने एक बार भी अपने बाबू जी.. अपने चाचा जी के प्रति विद्रोह कियाँ होता…

एक बार भी कहे होते कि “बाउजी ये आपका कैसा समाजवाद है.जिस समाजवाद में सिर्फ यादवाद और परिवारवाद है..?..

बाबूजी इन गूंडे बवालिओं को बाहर करिये वरना मैं कुर्सी छोड़ूंगा..” हाय ! तब तो बबलू बाबू किरकेट खेलते रहे…अउर लोकसभा में इज्जत ही नहीं रही..आज Up Election 2017 जब कपार पर आ गया. तब ईमानदारी और भ्रष्टाचार दिखने लगा है.. तब याद आया है कि जल्दी-जल्दी आधी-अधूरी योजनाओं का फीता काटा जाए वरना जनता से का कहेंगे..?
अरे महराज तिलकहरु न बनिए..आँखें खोलिए..

“अले ले ले अकलेस बाबू मेले कित्ते निम्मन हैं मत करिये.”

आज अखिलेश यादव बबलू बाबू की भूमिका में हैं..आ मुलायम सिंह यादव बैजू पांड़े की..और तिलेसर पांड़े की भूमिका में वो PR AGENCY हैं.जो करोड़ों अरबों लेकर बबलू बाबू की छवि चमकाने का समाजवादी ठेका लिए बैठीं हैं…और आप यहाँ इमोशनल होकर मूर्ख बन रहें हैं..
अरे ! मन से मोलायम जी को कच्चा खिलाड़ी समझतें हैं का ?. की..विधानसभा चुनाव के एन वक्त पहले इन झगड़ा-झंझट का हानि-लाभ उन्हें पता न हो..
महराज मुलायम सिंह यादव की गिनती देश के दूरद्रष्टा और कुशल राजनीतिज्ञ में होती है..
वो बहुत ही अच्छे तरीके से जानतें हैं कि राजनीति अब मण्डल-कमण्डल,तुष्टिकरण से ऊपर उठ चुकी है. उनका जमाना अब जाने वाला है..वो खोटे सिक्के मार्केट में अब नहीं चलेंगे..
अब नया जमाना आ गया..मोदीया का यही हाल रहा तो आने वाले सालों में चुनाव विकास,शुचिता ईमानदारी और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर लड़े जाएंगे..न की जातिवाद और सम्प्रदायवाद पर..
फिर इस बूढ़े हो रहे समाजवाद में कौन होगा जो डंटकर उसका मुकाबला करेगा.?..

एक ही सिक्का तो है.अपना अखिलेश बाबू..लम्बी रेस का घोड़ा..

त काहें ना तनिक बदनामी लेके उसे आबाद कर दिया जाए..अरे ! छह साल का निष्कासन तो छह दिन में खत्म हो जाएगा..आ अखिलेश अउर शिवपाल में समझौता भी हो जाएगा…लेकिन उसके बदले जो बबुआ की छवि बनेगी.. वो जीवन भर काम देगी..

दो हजार सतरह के बाद उन्नीस भी तैयार खड़ा है…बैजू तो बदनाम है ही..राज तो बबलू बाबू को ही करना है.

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