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…इसलिए सपा से निकाले गए अखिलेश, लंबे समय से बन रही थी योजना!

नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी अंततः दो फाड़ हो गई है। तमाम राजनीतिक विशेषज्ञों की इस उठापटक पर निगाहें बनी हुई हैं। इसी कड़ी में हम न्यूज18इंडिया के सीनियर प्रोड्यूशर मधुकर राजपूत के लेख को प्रकाशित कर रहे हैं। मधुकर राजपूत एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर गम्भीर नजर रखते हैं।
1. साल 2012, मार्च का अंत और अप्रैल की शुरुआत। ढलती वय की ओर तेजी से बढ़ रहे मुलायम पुत्र अखिलेश यादव को राजनीतिक उत्तराधिकारी स्थापित करने के लिए उतावले थे। तब भी प्रदर्शन थे, एक पक्ष में और दूसरा विपक्ष में। चाचा शिवपाल भरसक प्रयासों में थे कि अखिलेश की कुर्सी खींच ली जाए, लेकिन मुलायम सिंह यादव उस समय तय कर चुके थे कि पुत्र को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी स्थापित करेंगे। यही हुआ।
2. अक्टूबर 2016, 4 वर्ष और करीब कुछ महीनों का समय। पिता-पुत्र और चाचा की त्रयी में रार ठन गई। पहले पहल लगा कि मुलायम सिंह यादव अपने घोषित उत्तराधिकारी के साथ खड़े रहेंगे, लेकिन नहीं, मुलायम सिंह यादव ने पार्टी बचाने का आवरण खड़ा करके अपने भाई का साथ दिया। क्यों? उस समय वजह बताई कि अखिलेश की सौतेली मां का दबाव है। तो सवाल ये भी क्या जीवन के उत्तरार्ध की ओर बढ़ता एक कढ़ा, गुना राजनेता पत्नी के कहने पर अपनी पार्टी का वो राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा देगा जो समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय उदय की अंतिम उम्मीद है?
3. अखिलेश यादव के झगड़े में मुलायम गुरुत्वाकर्षण बने हैं जो पार्टी के विवादों को दबाए हुए हैं। साथ ही संतुलन कायम करने वाली तुला का काम करते रहे हैं। चाचा को साधा, बेटे को साधा। चाचा सध गए, लेकिन बेटा बिदक गया। वजह? पांच साल तक अखिलेश यादव ने समाजादी पार्टी के भ्रष्ट नेताओं, उनकी चाटुकार अफसरशाही और आराजक कार्यकर्ताओं को साधने में बिताए। इस बीच उनकी छवि एक सुधारवादी राजनेता के रूप में उभरी, लेकिन सत्ता के अवसानकाल में अतीक अहमद समेत ना जाने कितनी ऐसी चुनौतियां खड़ी कर दी गईं जो अखिलेश की पार्टी को धो पोंछकर साफ करने की कोशिश पर फिर से धब्बा बनीं। अखिलेश के पिता जातीय समीकरण, बाहुबल समीकरण से चुनाव से जीतने का सफल प्रयोग करते रहे हैं, लेकिन बेटा विकास के रास्ते चुनाव जीतने के प्रथम प्रयोग कर रहा है। मुलायम सशंकित हैं कि सत्ता जाएगी। पुत्र अखिलेश को विश्वास है कि वो कर लेंगे। ये एक राजनीतिक रूढ़ी और प्रयोगवादी विचार के बीच का टकराव है। ज़ाहिर है कि चिंगारी विद्रोह में बदलनी ही थी।
4. राजनीति में कुछ अकारण नहीं होता। अखिलेश ने भ्रष्ट चाचा चौकड़ी के सामने झुकने से इनकार कर दिया है। पार्टी के दो किनारे हैं अखिलेश और शिवपाल, बीच में शांत नदी से मुलायम बह रहे हैं। उन्होंने भविष्य भी शायद देख लिया है। वो अनुज शिवपाल का अहम भी तुष्ट कर रहे हैं और विद्रोह से बेटे का बतौर ईमानदार नेता उदय भी उन्हें निश्चित जान पड़ता है।
5. अखिलेश अलग होते हैं तो घर से कभी दूर नहीं होंगे। अलग लड़ते हैं तो गठबंधन के विकल्प कभी बंद नहीं होंगे। सपा के दो हिस्से और कांग्रेस तीसरा साथी। ये उत्तर प्रदेश का नया महागठबंधन हो सकता है। चुनाव में जीत चाहे जिसकी हो। साथ रहने और अलग होने इन दोनों ही सूरत में अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के निर्विवादित नेता बनकर उभरने की स्थिति में हैं।
6. बीजेपी को इस बात का इल्म होना चाहिए की समाजवादी पार्टी का झगड़ा प्रदेश में उसके लिए नया संकट साबित हो सकता है। अखिलेश सहानुभूति के रथ पर हैं, बीजेपी कौनसा नया रथ चलाएगी?
7. इंतज़ार कीजिए, कुछ बड़ा घटित होने के लिए भविष्य की डायरी चहलकदमी कर रहा है।

About Anchal Shukla

Young journalist from New Delhi. कराटे में ब्लैकबेल्ट चैंपियन। भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी की प्रशिक्षु नृत्यांगना। लचीली पर बेहद मजबूत। राजनीति से लेकर खेलों(हर तरह के खेल), मनोरंजन(हर इंडस्ट्री की खबरें), व्यापार, अंतर्राष्ट्रीय खबरें(व्यापार, तनाव, युद्ध) के साथ ही साहित्य में भी रूचि। सबकुछ समेटे और समाज की बुराइयों से लड़ने की ताकत रखने वाली मजबूत कलमकार बनने की कोशिश...

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