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नज़रिया- ‘तीन तलाक’ से मिली आजादी, मगर अत्याचार कब होगा खत्म ?

तीन तलाक को असंवैधानिक करार देकर सुप्रीम कोर्ट ने उन महिलाओं को जीत का एहसास दिलाया है, जो लंबे समय से इसके खिलाफ लड़ाई लड़ रहीं थीं । ये प्रथा आज की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है। पर तलाक का मतलब कई लोग ठीक से जानते ही नहीं हैं। कुरान शरीफ में तलाक देने की प्रकिया 3 महीने की बताई गई है। ये वो वक्त होता है, जिसके बीच में बीवी और शौहर अपने फैसले पर विचार कर सकें।
 
भारत में तीन तलाक के खिलाफ कई सामाजिक संगठनों ने अभियान छेड़ रखा था। पर इस मामले को ताजा किया शायरा बानो ने, जिनको तलाक तब मिला जब वो अपनी मां के इलाज के लिए उत्तराखंड आईं थीं। उनके शौहर ने उनको फोन पर ही तलाक दे दिया। शायरा ने इसके बीच अपने बच्चों से मिलने की गुहार भी लगाई, लेकिन सभी गुहारें अनसुनी कर दी गईं। फिर ये मामला धीरे-धीरे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इस पर सुनवाईंयां हुईं। और आखिरकार जो हुआ, वो आज आपके सबके सामने है।
 

तलाक और तलाक- ए -बिद्दत में फर्क समझें

इस तरह के फैसलों से देश की लगभग 9 करोड़ मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार मिल गया है। उनके मन से एक डर खत्म हो गया है, जो तीन तलाक के वक्त हुआ करता था। जो मामले पिछले कई दिनों से सामने आ रहे हैं, वो असल में तलाक नहीं बल्कि तलाक-ए-बिद्दत हैं। बिद्दत का मतलब ‘पाप’ होता है । ये मुस्लिम पुरुषों को तीन बार तलाक कहकर शादी का रिश्ता तोड़ने की आजादी देता है। कुरान में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा कि तीन बार तलाक बोलने से तलाक हो जाए। इसे मुस्लिम धर्मगुरुओं ने हमेशा अपने आप से पेश किया है।

मुसलमान और इस्लाम दोनों हैं अलग-अलग

अगर देखा जाए तो इस्लाम में भी तीन तलाक का जिक्र नहीं है । इस्लाम और मुसलमान दोनों काफी अलग-अलग हैं। कई ऐसी चीजें है जो इस्लाम में है, लेकिन मुसलमान उन्हें मानने से गुरेज करते हैं । कई मुसलमानों ने अधिकारों को अपने मतलब के लिए इस्तेमाल कर इस्लाम धर्म को बदनाम कर दिया है। आज वक्त इस धर्म को कैसे बचाया जाए, इसके बारे में सोचने का है। मुस्लिम पुरुषों को अपने सोच में सुधार लाने की जरुरत है। हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसके खिलाफ में भी बाते कही हैं । पर जो काम सुप्रीम कोर्ट ने किया है, वो पूरा नहीं है।
 
अभी भी तीन तलाक के अलावा कई ऐसे और मामले हैं, जो सामने नहीं आते। मुस्लिम महिलाएं इस्लाम धर्म में होने के बावजूद आज तक अत्याचार सहती आईं हैं, इस्लाम में उन्हें काफी अधिकार मिले हैं, लेकिन वो जागरुक नहीं हैं, इसलिए उनके साथ ज्यादत्तियां हो रहीं है। इस केस पर फैसले से मुस्लिम महिलाओं को भी एक मौका मिला है कि वो अब जागरुकता की ओर बढ़ें। शिक्षा के क्षेत्र में वो अपने हिस्सादारी बनाएं।
 
सबसे खास बात ये है कि इस फैसले का स्वागत सभी राजनीतिक पार्टियों ने किया है। ऐसा अक्सर देखा जाता है कि जब कोई इस तरह का फैसला कोर्ट की तरफ से आए, तो उस पर तीखे प्रहार शुरु हो जाते हैं, पर इस मामले में हालात दूसरे हैं। ये भी एक शुभ संकेत है। हालांकि अभी भी मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष जारी है। वो अपने आप को आगे लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। सुनहरा काल तब आएगा, जब वो भी कंधे से कंधा मिलाकर अपने मन मुताबिक जिंदगी जी सकें।
ज्ञानरंजन झा की फेसबुक वॉल से

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