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कहीं अतीत के पन्‍नों में गुम न हो जाए करोल बाग की लाइब्रेरी

मुजम्मिल

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश की आजादी से लेकर लगभग हर बड़े आंदोलनों में पुस्‍तकालयों की अहम भूमिका रही है। इसी भूमिका के महत्‍व को समझते हुए  देश्‍ा में वाचनालयों की स्‍थापना की गई। आजादी से पहले, आजादी के वक्‍त और आजादी के बाद तक पुस्‍तकालयों के विकास पर ध्‍यान दिया गया। पुस्‍तकालयों के विकास उसे समृद्ध बनाने के लिए संस्‍थाएं बनाई गई। उन्‍हें जिम्‍मेदारी सौपी गई कि पुस्‍तकालयों से युवा जुडें और पुस्‍तकों की सान पर अपने विचारों को धार दें। इसी का परिणाम था कि यूनेस्‍को की मदद से पंडित जवाहरलाल नेहरु ने 1951 में दिल्‍ली पब्लिक लाइब्रेरी (डीपीएस) की स्‍‍थापना की। इसके तहत दिल्‍ली में साल 2005 तक 65 इकाइयां स्‍थापित की गई लेकिन वर्तमान में 45 केवल पुस्‍तकालय ही चल रहे हैं। जिनकी हालत भी अब खस्‍ता हाल है।

यों तो पूरे देश में ही ज्‍यादातर लाइब्रेरियों की हालत खराब है और सरकारी, राजनीतिक उपेक्षा शिकार हैं।  उन पुस्‍तकालयों को जिन्‍हें युवाओं को वैचारिक रूप से समृद्ध बनाने के लिए दान और आपसी मदद से खोला गया था उन जमीनों पर अब बिल्‍डरों की नजर है। उन्‍हें पुस्‍तकालयों की जमीन दिखाई दे रही है, ताकि वहां मल्‍टीप्‍लेक्‍स या शाॅपिंग मॉल खोले जा सकें। ऐसी ही एक लाइब्रेरी राजधानी दिल्‍ली के करोल बाग के झुग्‍गी-बस्‍ती में है। जो अपने पुराने अतीत के साथ अपने अस्तित्‍व की लड़ाई लड़ रहा है। डीपीएल के पुराने पाठक सुभाष गौतम बताते हैं कि इस लाइब्रेरी में कई ऐसी पुस्‍तकें और पठन सामग्रियां हैं जो दुर्लभ होने के साथ ही सर्वसुलभ भी हैं। गौतम बताते हैं कि यहां अखबारों के सालों पुराने संग्रह मौजूद हैं इसके अलावा बहुत सारी ऐसी किताबें हैं जो दिल्‍ली की दूसरी लाइब्रेरियों में नहीं।

गौतम पेशे से पत्रकारिता के शिक्षक भी हैं और राजधानी के विभिन्‍न बड़े संस्‍थानाें में बतौर अ‍तिथि शिक्षक पढ़ाते हैं। उन्‍होंने बताया कि रिसर्च करने वाले छात्रों के लिए ऐसी बहुत कम लाइब्रेरियां हैं जिनके पास पुस्‍तकों का अच्‍छा संदर्भ है। गौतम का कहना है प्राइवेटाइजेश के दौर में इन पुस्‍तकालयों को बचाना बेहद जरूरी है। क्‍योंकि प्राइवेट कंपनियां सदर्भ संरक्षक संदर्भों के संरक्षण शुल्‍क के  नाम पर काफ मोटी रकम वसूलती हैं। जो कम पैसे में रिसर्च करने वाले छात्रों के लिए वहन करना काफी मुश्किल होगा। दूसरी ओर पुस्‍तकालयों पर काम कर रहे पूर्व वरिष्‍ठ पत्रकार और लेखक अनिल चमडिया बताते हैं कि करोल बाग की लाइब्रेरी बनाने के पीछे लोक कल्‍याण की भावना थी ताकि उन बच्‍चों तक भी शिक्षा पहुंचे जो पीढि़यों से वंचित हैं। इस लाइब्रेेरी के तकरीबन27 हजार से ज्‍यादा सदस्य हैं प्रतिदिन करीब 150 से200 तक रोजाना पाठकों काआना होता है। ये अखबार से  लेकर मैगजीन से तमाम तरह किताबें पढ़ने आते हैं।

इधर तिमारपुर से विधायक जो इस लाइब्रेरी को बचने की मुहिम में लगे हैं, उनका कहना है कि यहां बच्‍चों के लिए प्रतियोगिताओं से लेेकर अाइएएस, पीसीएस की तैयारियों से जुड़ी किताबों का अच्‍छा संग्रह जिसका लाभ यहां के गरीब बच्‍चों को मिल सकता है लेेकिन बिल्‍डरों को इसमें जमीन नजर आ रही है।

संस्‍कृति मंत्रालय की देख रेख में चलने वाली इस लाइब्रेरी की स्‍थापना साल 1965 में  की गई। साल 2005 में इस लाइब्रेरी को बिल्‍डर कंपनी को बेच दिया गया। मालिकाना हक उसके पास है लेकिन एक नियम के अनुसार 3500 रुपए से कम देने वाली संपत्ति को जबरन खाली नहीं कराया जा सकता। बिल्‍डरों ने एमसीडी पर दबाव डलवाकर डीपीएल करोल बाग लाइब्रेरी के भवन को रातो-रात खतरनाक घोषित करवा कर अगले दिन उसका गिराया जाने लगा। इतना ही नहीं दिल्‍ली लाइब्रेरी बोर्ड मना करने के बावजूद बिना मंत्रालय को सूचना दिए लाइब्रेरी के चेयरमैन ने बिल्‍डर के दबाव में खुद ही लिखकर ये दे दिया कि एक महीने में लाइब्रेरी की बिल्डिंग खाली कर दी जाएगी। लाइब्रेरी के भवन को तोड़े जाने की सूचना पाठकों ने लाइब्रेरी बोर्ड को दी। इसके बाद बोर्ड सक्रीय हुआ और उसने लाइब्रेरी को बचाने के लिए पीआइएल दाखिल किया गया।

जिसके बाद लाइब्रेरी को बचाने की मुहिम शुरू की गई। जाने माने लेखक राम बहादुर राय ने बताया कि इस लाइब्रेरी में उर्दू की बेहतरीन किताबें मौजूद हैं जो यकीन इस देश की धरोरह है जिसे बचाकर रखना हमारा कर्तव्‍य है।

 

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