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इंदरजीत कौर

ये कोशिश हैं किसी के काम आने का….

 

मुजम्मिल

जो जिस माहौल में पला बढ़ा होता है आगे चलकर वो वही करने की कोशिश करता है। असल में हमारी आदत शुरू से सेवा की और गुरुद्वारे जाने की थी। वहां लोगों को लंगर खिलाने और भूखों जरूरत मंदों के लिए कुछ करने की सोच थी। जिसका नतीजा यह है कि आज मैं अपने और अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर अस्पलात में जरूरतमंद लोगों की मदद कर रही हूं। ये कहना है 54 साल की इंदरजीत कौर का। वो कहती हैं कि मेरी कोशिश है कि ऊपर वाले ने हमें जितना दिया है उसी में से हम उन लोगों के लिए कुछ करें जिन्हें हमारी मदद की जरूरत है हालंकि जरूरत तो बहुत की है। ये वो लोग हैं जो भिखारी नहीं हैं। वो भीख मांगकर या किसी के सामाने हाथ फैलाकर अपनी जरूरत पूरी नहीं कर सकते हैं। उनका सम्मान भी बचा रहे और हमारी सेवा भी हो जाए।

जीटीबी कैंसर अस्पताल और राम मनोहर लोहिया अस्पलात में बीमारों और उनके साथ आए लोगों को लंगर खिलाती हैं। वो कहती हैं कि बीमारों और उनके साथ आए लोग कई बार काफी अच्छे घरों से होते हैं लेकिन आज वो लाचार हैं। आज उनके पास कोई संसाधन नहीं है हम इन्हीं लोगों की मदद करने की कोशिश करते हैं। क्योंकि बीमारों के साथ आए लोगों के सामने यह भी समस्या होती है कि वो मरीज के लिए खाना कहां बनाएं।

कौर बताती हैं कि उन्हें अस्पतालों में बीमार और उनके साथ आए तीमारदारों की सेवा की शुरुआत करीब एक साल पहले की। यह विचार उन्हें अस्पतालों में लोगों की मजबूरियों को देखकर आया। कौर बताती हैं कि एक बार वो किसी को देखने जीटीबी अस्पताल गर्इं। लोगों की मजबूरियों ने उन्हें इतना द्रवित कर दिया कि उन्होंने उन्हें लगा कि इन लोगों के किए कुछ किया जाए। यह सोचकर उन्होंने शुरुआत में पुलाव बनाकर लोगों को खिलाना शुरू किया। तब वो अकेले ही लोगों दो-तीन सौ लोगों के लिए खाने का प्रबंध करतीं थी। लेकिन पुलाव ज्यादातर मरीजों के लिए ठीक नहीं होता था। इंदरजीत बताती हैं कि जीटीबी कैंसर हॉस्पिटल में लोग चावल खाना नहीं पसंद करते क्योंकि इलाज के दौरान उन्हें परेशानी होती थी अब वो उनके लिए रोटी दाल और दलिया लेकर जाती हैं। कौर यहां दो दिन का लंगर लगाती हैं। कौर कहती हैं कि हमारी कोशिश और ज्यादा दिन लगाने की है लेकिन फंड की कमी हो जाती है। इसके अलावा यहां जगह भी नहीं है।

राममनोहर लोहिया अस्पताल में भी उनका एक दिन का लंगर लगता है। यहां वो चावल, दाल, बिस्कुट, चाय और पानी का लंगर करवाती हैं। इसके अलावा आइटीओ के पास के एक स्लम बस्ती में भी जरूरतमंद बच्चों के लिए लंगर की व्यवस्था करती हैं। उन्होंने बताया कि ये बच्चे भीख नहीं मांगते लेकिन उन्हें समाज मे लोगों की जरूरत है। अब उनके साथ करीब चालीस लोग जुड़ गए हैं। जिनमें संगीता बिल्ला, वंदना साहू, जसविंदर सिंह, वरिंदर अरोड़ा और डॉक्टर हरमीत हैं जो हमारे साथ जुड़े हैं।

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