Wednesday , September 20 2017
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FILM REVIEW: बेदम और सुस्त है ‘जब हैरी मेट सेजल’ की कहानी

कहने को तो शाहरुख खान और इम्तियाज अली  दोनों दिग्गज हैं मगर अब दोनों में पहले के तरह जोश नहीं रहा।इस फिल्म में दोनों ने एक-दूसरे को सहारा देने की कोशिश की परंतु बुरी तरह फेल हो गये। कभी लवस्टोरी की कहानी में फेमस इम्तियाज की ये कहानी बिलकुल निराश करती …

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रिव्यू-मजबूरी का नाम ‘इंदु सरकार’

  दो-चार सौ साल पहले कीकिसी घटना या व्यक्ति परफिल्म बने और उसे लेकरलोगों के अलग-अलग नजरिएसामने आएं, हंगामा या विवादहो तो भी समझ में आता है।लेकिन महज 35-40 सालपहले के कालखंड पर कोईफिल्मकार खुल कर इस डर सेअपनी बात न कह सके किसरकार क्या कहेगी, सैंसर बुरान मान जाए, किसी कौम या पार्टी के बंदे न पीछे पड़ जाएं, तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। ताजा मिसाल मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ है। 1975-77 के आपातकाल के दौरानइस देश ने काफी कुछ झेला। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके सुपर पॉवरफुलबेटे संजय गांधी ने पूरे देश को अपनी मुठ्ठी में किया हुआ था। उस दौरान जो कुछ भी हुआ,वह कागजों में मौजूद है, उस दौर के कई लोग भी हमारे बीच हैं जिनका देखा और लिखाहुआ भी उपलब्ध है। उन उपलब्ध दस्तावेजों, यादों और पत्रकार राम बहादुर राय जैसे कईव्यक्तियों से मिली जानकारियों के बाद बनी इस फिल्म में उन 19-20 महीनों की कई सच्चीघटनाओं का जिक्र है लेकिन अगर फिल्म के शुरू में ही एक लंबा डिस्क्लेमर यह कह दे कियह सब काल्पनिक है तो यकीन मानिए इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। फिल्म में कहीं किसी चरित्र का असली नाम नहीं है। ऐसा ही शुजित सरकार की ‘मद्रास कैफे’में भी था लेकिन यह फिल्म न तो उस जैसी शानदार बन पाई और न ही हार्ड-हिटिंग। मधुरने इसमें आपातकाल की पृष्ठभूमि में एक औरत इंदु सरकार की निजी कहानी दिखाई हैजिसके बहाने से वह उस दौर की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को पिरोते चलते हैं। लेकिन जबमधुर किसी खास चीज को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देते हैं और किसी को बस छू करनिकल जाते हैं तो साफ महसूस होता है कि उनकी नीयत सिनेमा के जरिए किसी एजेंडा कोसाधने की थी। एक फिल्मकार जब यूं किसी एक पक्ष की तरफ झुकने लगे तो यह सिनेमाका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। कीर्ति कुल्हारी, तोता रॉय चौधरी, अनुपम खेर, शीबा चड्ढा, अंकुर विकल, जाकिर हुसैनजैसे सभी कलाकारों का काम प्रभावी रहा है। नील नितिन मुकेश बेहद असरदार रहे।फिल्म को लेकर किए गए शोध की झलक तो इसमें दिखती है लेकिन उसे रियल टच देने केलिए जिस डिटेलिंग की जरूरत थी उसमें काफी कमियां रह गईं। अपनी फिल्मों में अभी तकसिर्फ मुंबईया माहौल दिखाते रहे मधुर पहली बार बाहर निकले और दिल्ली पर केंद्रितकहानी चुनी लेकिन शूटिंग के लिए उन्हें फिर वही मुंबई ही मिला? फिल्म के सैट उनके रचेइस नकली माहौल की पोल खोलते हैं। यह बनावटीपन कहानी में भी झलकता है जब पर्दे परहोने वाला अत्याचार और बर्बरता आपके अंदर टीस जगाने या आपको मुट्ठियां भींचने परमजबूर नहीं कर पाती। फिल्म में इमरजेंसी के दौर के कई चरित्र हैं लेकिन अगर आपनेइतिहास नहीं पढ़ा है तो आप उन्हें पहचान नहीं पाते और न ही उनके साथ जुड़ पाते हैं।बतौर फिल्मकार मधुर इस फिल्म में मजबूर दिखे। हाथ में हथौड़ा हो और आप जोर से चोटमारने की बजाय बस ठकठका कर रह जाएं तो यह दुर्भाग्य ही है… आपका, हमारा, सिनेमाका, इस देश का। अपनी रेटिंग-दो स्टार    दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म–पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने‘सिनेयात्राब्लॉग’ के अलावा समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपकरेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)  

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FILM REVIEW:सिचुएशनल कॉमेडी से भरपूर ‘मुबारकां’

डायरेक्टर अनीस बज्मी की फिल्म ‘मुबारकां’ सिनेमा हॉल में रिलीज हो गई है।अनीस बज्मी को फैमिली एंटरटेनिंग फिल्मों के लिए जाना जाता है। फिल्म प्यार तो होना ही था, नो एंट्री, वेलकम, सिंह इज किंग जैसी बेहतरीन फिल्मों को अनीस ने ही डायरेक्ट किया है।अब एक बार फिर से फैमिली …

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Movie Review:1945 की अनसुनी दास्तां है ‘राग देश’

डायरेक्टर तिग्मांशु धुलिया का नाम सामने आते ही दिमाग में ‘पान सिंह तोमर’ और ‘साहिब बीवी और गैंगस्टर’ जैसी फिल्में सामने नजर आने लगती. इस बार तिग्मांशु ने एक अलग सब्जेक्ट पर फिल्म  बनाने की कोशिश की है। निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने आजादी से लड़ने के इस जंग की कहानी …

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FILM REVIEW:वस्त्रहीन दृश्य के अलावा भी बहुत कुछ दिखाती “लिपस्टिक अंडर माय बुर्का”

“लिपस्टिक अंडर माय बुर्का” कोई मसाला फिल्म नहीं है इस फिल्म में आपको कॉमेडी, फूहड़ जोक्स या आइटम सॉन्ग देखने को नही मिलेंगे इसलिए सिनेप्रेमियों का शायद एक खास तरह का तपका इसे पसंद ना करे। साथ ही फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट मिला है। जिसकी वजह से सभी लोग इस …

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FILM REVIEW: रात के अंधेरे में सच्चाई दिखाती रवीना टंडन की ‘शब’

रवीना टंडन की ‘शब’ आज देश के सभी सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है । फ़िल्म वाकई में काफी शानदार है। कहानी पुरानी है पर उसे नए तरीके से पेश किया गया है। फ़िल्म में 3 अलग-अलग किरदार हैं, जो आपस मे जुड़े हुए हैं। वे सभी एक दूसरे के …

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रिव्यू-‘बहन होगी तेरी’… राॅम-काॅम सत्य है

मौहल्ले की लड़कियां बहनें होती हैं। इससीख को बचपन से सुनने के बाद भी कबवे लड़कियां ‘कुछ और’ लगने लगती हैंऔर पड़ोसियों की मदद करते-करते कबवे करीब आने लगती हैं, पता ही नहींचलता। लेकिन अब घरवालों का क्याकरें, वे तो दोनों को बहन-भाई मानते हैं।लड़कियां तो पारिवारिक दबाव में किसीऔर …

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फिल्‍म रिव्‍यू: उम्‍मीद से कम ‘सुशांत सिंह राजपुत और कृति सेनन की ‘राब्ता’

सुशांत सिंह राजपुत और कृति सेनन की फिल्म राब्ता इस हफ्ते सिनेमाघरो में रिलीज हो गई हैं। फिल्म का निर्देशन किया हैं दिनेश विजान ने। वही इसमें सुशांत और कृति के अलावा राजकुमार राव, वरुण, जिम सरब जैसे उम्दा कलाकार हैं। कहानी पंजाब का रहने वाला शिव (सुशांत सिंह राजपुत) …

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FILM REVIEW:’हाफ गर्लफ्रेंड’ के नाम पर युवाओं को इम्प्रेस करने में नाकाम रहे मोहित

हर शुक्रवार को कोई न कोई फिल्म रिलीज होती है।इस शुक्रवार को रिलीज हुई डायरेक्‍टर मोहित सूरी की फिल्‍म ‘हाफ गर्लफ्रेंड’। पहली बार अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर की जोड़ी एक साथ नजर आ रही है।इस फिल्‍म में अर्जुन और श्रद्धा के अलावा विक्रांत मैसे और सीमा बिस्वास भी नजर …

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FILM REVIEW:शिक्षा के व्‍यवसाय को दर्शाती ‘हिंदी मीडियम’

कुछ संदेशों के साथ ‘हिंदी मीडियम’ उन प्रश्नों के जवाब देने की कोशिश करती है जो आज की एज्युकेशन सिस्टम से जुड़े हुए हैं। यह आज के स्कूलों की खामियों और कमियों पर प्रकाश डालती है।स्‍कूलों में शिक्षा से ज्‍यादा पैसे का बोलबाला है। देश के कई बड़े स्‍कूल एक …

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