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उत्तर प्रदेश में बीमारी प्रति एक लाख पुरुषोँ पर 411 को और प्रति एक लाख महिलाओँ पर 261 को प्रभावित कर रहा है

कोलम्बिया एशिया हॉस्पिटल, गाज़ियाबाद के कंसल्टेंट-पल्मनोलॉजी डॉ ज्ञान भारती कहते हैं,“राष्ट्रीय ट्रेंड से अलग महिलाओँ व पुरुसःओँ दोनो में ही बीमारी का प्रसार अधिक होना बडी चिंता का विषय है। टीबी जहाँ पुरुषोँ व महिलाओँ दोनो को प्रभावित कर रही है,  वहीँ दुनिया भर में 25 से 59 आयुवर्ग की महिलाओँ में यह मौत का 5वाँ सबसे बडा कारण बन गया है। मातृ स्वास्थ्य पर टीबी का बहुत अधिक प्रभाव है और इसके चलते न सिर्फ गर्भावस्था में मृत्यु का खतरा 6 गुना अधिक बढ जाता है बल्कि समय से पहले बच्चे के जन्म की आशंका भी दोगुना रहती है। इसके साथ ही जेनाइटल टीबी, जो आसानी से पकड में नही आती है,बांझपन का एक महत्वपूर्ण कारण है। जिन गर्भवती महिलाओँ को एचआईवी और टीबी होता है उनके नवजात शिशु की मृत्यु का खतरा 300% अधिक होता है। खासतौर से भार में जिन महिलाओँ को एचआईवी संक्रमण के साथ टीबी होता है उनके अजन्मे बच्चे में एचआईवी के प्रसार का खतरा दोगुना होता है। खास बात यह है  भारत में महिलाएँ अपने मुकाबले परिवार की सेहत और उनके मामलोँ को अधिक महत्व देती हैं,साथ ही यहाँ भेदभाव और स्टिगमा भी अधिक है, जिसके चलते सही समय पर बीमारी की जांच और इलाज नहीम हो पाता है। पुरुषोँ पर आर्थिक निर्भरता और अन्य सांस्कृतिक और आर्थिक रुकावटोँ के चलते महिलाएँ समय पर जांच और इलाज के लिए पहुंचती ही नहीं हैं।“

बीमारी के मामले में दुनिया भर का एक चौथाई बोझ अकेले भारत पर है। भारत सरकार की एक 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बीमारी के 28 लाख मामले हैं और देश में एक साल के अंदर 4.8 लाख लोगोँ की इसके चलते मौत हो जाती है। इसके साथ ही पुरुषोँ के मुकाबले महिलाओँ में बीमारी के मामले अधिक हैं, जबकि इस मामले में वैश्विक ट्रेंड इसके विपरीत है।

नेशनल स्ट्रेटजिक प्लान फॉर ट्युबेरोकुलोसिस एलिमिनेशन के अनुसार, भारत सरकार ने यह लक्ष्य रखा है कि वर्ष 2025 तक टीबी से एक भी मौत नही होनी चाहिए। सरकार द्वारा चलाया जा रहा टीबी नियंत्रण कार्यक्रम बेहद तेजी से आगे बढ रहा है और इसके लिए न सिर्फ सरकारी बल्कि निजी मशीनरी को भी साथ में लिया गया है, बावजूद इसके अभि तमाम चुनौतियोँ को और गम्भीरता से लेने की जरूरत है।

 

डॉ ज्ञान भारती कहते हैं, “ऐसा अनुमान है कि देश में हर साल एचआईवी समबंधित टीबी के एक लाख मामले दर्ज हो रहे हैं और इसके चलते सालाना लगभग 37,000 लोगोँ की मौत हो रही है। मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी का बर्डेन भी भारत में ही सबसे अधिक है। यहाँ तकरीबन 1.3 लाख लोग मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की गिरफ्त में हैं। एचआईवी सम्क्रमित मरीजोँ को टीबी होने का खतरा काफी ज्यादा रहता है क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। हालांकि इन दोनो ही बीमारियोँ के संक्रमण का स्रोत अलग होता है, एक वायरल संक्रमण है तो दूसरा बैक्टीरियल, बावजूद इसके ये दोनोँ ही बीमारियाँ एक-दूसरे को प्रोत्साहित करती हैं। एक अन्य चुनौती है मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस टीबी अथ्वा एमडीआर टीबी की, यह तब होता है जब टीबी के बैक्टीरिया इसके इलाज में इस्तेमाल होने वाले एंटीमाइक्रोबियल दवाओँ के लिए प्रतिरोध क्षमता विकसित कर लेते हैं। टीबी का सही प्रबंधन न होने से और एमडीआर-टीबी के वायरस का संक्रमण होना दो महत्वपूर्ण कारण हैं जिनके चलते देश में एमडीआर टीबी के मामले बढ रहे हैं। टीबी के इलाज हेतु दी गई दवाओँ को ठी से न लेने की वजह से भी बैक्टीरिया रेजिस्टेंस हो जाते हैं। बीच में दवा लेना बंद कर देने से बैक्टीरिया का असर और तेजी से बढता है और ये रेजिस्टेंट स्ट्रेन में बदलने लगते हैं, और ऐसी स्थिति में पूरी तरह से ठीक हो सकने वाली यह बीमारी लाइलाज हो जाती है।“

टीबी के इलाज में यह बेहद जरूरी है कि दवाओँ का सही फॉर्मुला इस्तेमाल हो, इन्हेँ सही ढंग से लिया जाए और किसी भी कीमत पर इलाज में लापरवाही न की जाए।टीबी के बैक्टीरिया हवा के जरिए किसी अन्य व्यक्ति को तब प्रभावित करते हैं जब संक्रमित व्यक्ति खांसता, छींकता, बोलता, गाता है। संक्रमण से बचाव के लिए सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।

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