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सुख और दुख क्या हैं? जानिये आज के अनमोल वचन में

प्रत्येक व्यक्ति सुख चाहता है, वह कभी नहीं चाहेगा कि दुख उसके निकट भी आये। सुख और दुख क्या हैं, इसे वह नहीं जानता। ये दोनों शब्द संस्कृत के हैं। संस्कृत में सु कहते हैं अच्छे को और दु कहते हैं बुरे को, ख कहते हैं इन्द्रियों को। इन्द्रियों का अच्छा होना वश में रहना सुख है और इन्द्रियों का बुरा होना, बेकाबू हो जाना दुख है। कितनी सरल और सीधी बात है यह। दुख चाहते हो तो भाई इन्द्रियों की गुलामी करो, इनके अधीन हो जाओ, इनको बेलगाम हो जाने दो। जैसे वे चाहें, वैसा ही करते रहो और यदि सुख चाहते हो तो इनकी गुलामी से छुटकारा पाओ, इन्हें वश में करो, इनसे आजादी प्राप्त कर लो, तभी तुम श्रेष्ठ और सुखी बनोगे। अग्नि से शिक्षा लो, अग्नि का धर्म है ऊपर उठना, आगे बढना। आप भी इन्द्रियों को वश में करके आगे बढो, ऊपर उठो अर्थात उन्नति करो। यही तो मनुष्य जीवन का ध्येय है, चलते-चलते कई बार ठोकर लगती है, आदमी फिसल भी जाता है, गिर भी जाता है, फिर गिरने के बाद क्या गिरा ही रहेगा, नहीं। उठो फिर आगे बढो। अग्नि की तरह ऊपर उठो, उन्नति करो। यह जीवन गिरने के लिये या गिरे रहने के लिये नहीं, आगे बढने के लिये है। बैठ जाने के लिये नहीं। अग्नि को देखो, वह रूकावट को जलाकर आगे बढती है, रूकती नहीं, ठहरती नहीं।

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