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जाड़े की मुश्किलों से बचने के रास्ते

 

मौसम में खासकर सुस्ती की महीनों के दौरान वजन बढ़ना सभी के लिए चिंता का मामला होता है। विटामिन डी की कमी से लेकर शरीर के तापमान जैसे कई कारक जाड़े में वजन बढ़ा सकते हैं। छुट्टी के दिनों में जमकर खाने, ढेरों पार्टियों में जाकर जरूरत से अधिक पेट भरने से अचानक पता चलता है कि आपकी जीन्स चुस्त होने लगी है। कई अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि व्यक्ति की खानपान की आदतों में जलवायु की बड़ी भूमिका होती है। कार्बोहाइड्रेट्स का सेवन बढ़ जाता है और पानी पीना कम हो जाता है जोकि स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छी आदत नहीं है और आमतौर पर यह जाड़ों के दौरान यह आदत लग जाती है। हममे से ज्यादातर लोग ठंड का मौसम होने के चलते जाड़े में व्यायाम करना बंद कर देते हैं। कई अध्ययनों से यह भी साबित हुआ है कि ठंडे तापमान के संपर्क में आने से शरीर की रोग प्रतिकारक क्षमता घट जाती है जिससे स्वास्थ्य संबंधी कई दिक्कतें पैदा हो जाती हैं।

भारत में गैर संचारी रोग तेजी से फैल रहा है। इसकी सबसे आम वजह अस्वस्थ जीवनशैली अपनाना, मिलावटी खाद्य पदार्थों का सेवन, तनाव और शारीरिक श्रम की कमी के साथ ही खानपान की गलत आदतें हैं। वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ मंजरी चंद्रा का कहना है, “शारीरिक श्रम की कमी और अस्वस्थ जंक फूड का सेवन करने की वजह से मौसम में वजन का बढ़ना बहुत आम बात है। लोगों को अखरोट, हरे पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फलों, शकरकंद और अंडे खाना चाहिए। नमक और चीनी का सेवन घटाना और इसके स्थान पर सेंधा नमक, गुड़, शहद आदि लेना बहुत आवश्यक है। साथ ही तेल का उपभोग भी नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है। जाड़े के मौसम में अक्सर लोगों को तली हुई चीजें खाते अधिक देखा जाता है। प्रतिदिन के खाने में कम से कम तेल होने से लंबे समय में लोगों और उनके परिवारों का अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित होता है।”

वजन न बढ़े इसके लिए दूसरा विकल्प आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाना है। आयुर्वेद के हिसाब से रोग प्रतिकारक क्षमता पाचन से जुड़ी है। जब पाचन मजबूत होगा और भूख अच्छी लगेगी तो रोग प्रतिकारक क्षमता मजबूत रहेगी। जब कभी पाचन कमजोर होता है, रोग प्रतिकारक क्षमता अपने आप कमजोर हो जाती है। इस बारे में महर्षि आयुर्वेद अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डाक्टर सौरभ शर्मा का कहना है, “जाड़े का मौसम ऐसा सीजन होता है जब प्रकृति हमारा पोषण करने को तैयार रहती है। पाचन का स्तर बहुत ऊंचा होने की वजह से भूख और पाचन की ताकत अन्य सीजन की मुकाबले अधिक होती है। लोग सोचते हैं कि यह सीजन रोग प्रतिकारक क्षमता के लिए खराब है क्योंकि वे अस्वास्थ्यकर खाना और जल्दी हजम नहीं होने वाला खाना खाते हैं जिससे उनकी रोग प्रतिकारक क्षमता सुस्त हो जाती है। जैसे ही भूख बढ़ती है, लोग अधिक जंक फूड, भारी खाना और आसानी से हजम नहीं होने वाली चीजें खाने लगते हैं। लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि खराब रोग प्रतिकारक क्षमता का निर्माण हम स्वयं कर रहे हैं और प्रकृति इसके लिए दोषी नहीं है। इस सीजन के लिए यह अधिक महत्वपूर्ण है कि लोग जाड़े के दौरान रोग प्रतिकारक क्षमता बढ़ाने वाली चीजें खाएं और आयुर्वेद के हिसाब से दिनचर्या अपनाएं।”

निम्न पोषण स्तर में धीमी गिरावट और मोटापा एवं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में बढ़ोतरी को महसूस करते हुए केंद्र सरकार और सरकारी एजेंसियों ने रोकथाम संबंधी एवं जागरूकता बढ़ाने के कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। फूड फोर्टिफिकेशन, खाद्य सुरक्षा, चीनी, नमक और तेल के सेवन में कमी लाना और जीवन के प्रथम 1000 दिनों में पोषण जैसे मुद्दों को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) का ईट राइट इंडिया मूवमेंट, इसी तरह की एक पहल है। एक बड़ी आबादी तक ईट राइट इंडिया मूवमेंट का प्रचार प्रसार करने के प्रयास के तहत स्वस्थ भारत यात्रा शुरू की गई। इसमें करीब 750 साइकिल सवार दिल्ली रवाना हुए हैं। यह यात्रा 1930 के दांडी मार्च से प्रेरणा लेकर शुरू की गई है।

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